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भुला दिए गए हैं जुगनी गाने वाले जांबाज

अमृतसर. singer आजादी की जंग में जनमानस को आंदोलित करने वाले क्रांति गीत ‘जुगनी’ के गायकों को बेशक भुला दिया गया हो, लेकिन एक वक्त था जब उन्होंने अपने सुर-साज से अंग्रेज हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं। यूं तो जुगनी के 100 साल पूरे हो चुके हैं और दुनियाभर में बसे पंजाबी आज भी इसकी स्वर लहरियों पर तरंगित होते हैं, लेकिन इसके पीछे बिशना व मंडा की कुर्बानी शायद ही किसी को याद हो।

जुबली का नाम बिगड़कर जुगनी हुआ
लोक गायन की इस विधा को प्रचलित का श्रेय अंग्रेजी हुकूमत को जाता है। स्वतंत्रता सेनानी बाबा मक्खन सिंह के अनुसार, जुगनी 1906-07 में तब वजूद में आई, जब ब्रिटिश साम्राज्य महारानी विक्टोरिया की ताजपोशी के 50 साल मना रहा था। उस समय ब्रिटिश हुकूमत भारत में भी गोल्डन जुबली मशाल निकाल रही थी।

सोने के पात्र में जलती इस मशाल को सरकारी संरक्षण में गांवों-शहरों तक ले जाया जाता था। लोकगायक मंडा व बिशना उस वक्त मेहनताना लेकर प्रशंसा-गीत गाया करते थे। कहा जता है कि वे दोनों अनपढ़ थे, नतीजतन जुबली का नाम बिगड़ते-बिगड़ते जुगनी हो गया। बिशना व मंडा ने सरकार की प्रशंसा के साथ-साथ उस वक्तके सूखे की पीड़ा का भी इजहार किया। जनता में सरकार के खिलाफ रोष भर चुका था और जुगनी से इसे हवा मिली।

सरकार ने उन पर प्रतिबंध लगा दिया। बावजूद इसके, जहां भी जुबली मशाल जाती, दोनों वहां जाते और थोड़ी दूर मंच लगाकर गीत पेश करते। पुलिस वहां मौजूद भीड़ पर लाठियां बरसाती। गुजरांवाला में जब ये दोनों गीत पेश कर रहे थे तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर बुरी तरह पीटा। विद्वानों का मानना है कि उसी रात उन्हें मारकर कहीं दफन कर दिया गया।

सुरों की श्रद्धाजंलि
पंडित दीवान चंद खडूर साहिब वाले लिखते हैं कि मंडा अमृतसर के हसनपुर वैरोवाल का रहने वाला मरासी था और उसका असल नाम मोहम्मद था, जबकि बिशना जट बिरादरी से था। वर्तमान में जुगनी को नया आयाम देने वालों में आलम लोहार, आरिफ लोहार, सलीम-जावेद, आसा सिंह मस्ताना, कुलदीप माणक और गुरमीत बावा हैं जिन्होंने इसे सरहद पार तक पहुंचाया।





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