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‘हम’, ‘वो’ में बंट गए गुर्जर : रिपोर्ट

जयपुर. गुर्जर नेता अपने आपको समाज से जोड़कर चौपड़ा समिति के सामने तर्क प्रस्तुत करने में नाकाम रहे, जिसके कारण उनका जनजाति में शामिल होने का दावा कमजोर पड़ गया। इन नेताओं ने चौपड़ा समिति की सुनवाई के दौरान खुद को ‘हम’ और पूरे गुर्जर समाज को बार-बार ‘वो’ कहकर संबोधित किया। चौपड़ा समिति की रिपोर्ट में इसका बड़ा ही रोचक वर्णन है।

चौपड़ा समिति की रिपोर्ट के पेज 175 से 189 के बीच पूरी सुनवाई का खुलासा करते हुए गुर्जर नेताओं के कई रोचक किस्से दिए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ज्यादातर गुर्जर नेताओं ने एक बार भी अपने आपको पूरे समाज से जोड़कर पेश नहीं किया। उनके तर्क इस तरह थे, मानो गुर्जर समाज कोई और समुदाय है और वे किसी और समाज के सदस्य हैं। किसी गुर्जर नेता ने ये नहीं कहा, मैं जनजाति से हूं।

प्रदेश के विभिन्न गुर्जर बहुल इलाकों के दौरे का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में चौपड़ा समिति ने कहा है कि छह दशक के विकास के बाजवूद प्रदेश में निर्धनता, विपन्नता और अभावों के द्वीप मौजूद हैं। ये हालात नाकाबिले-बर्दाश्त हैं और इन्हें तत्काल दुरुस्त करने की जरूरत है। लेकिन गुर्जर नेताओं ने इन कड़वी हकीकतों से खुद को नहीं जोड़ा।

किस्सा एक
उत्तरप्रदेश के एक प्रोफेसर समिति के सामने आए तो वे बार-बार अपने लिए ‘हम’ और गुर्जर समाज के लिए ‘उन’ और ‘वो’ की टेर लगाते रहे। इन महाशय से समिति के सदस्यों ने पूछा भी कि उनका ‘वो’ से क्या मतलब है? इस पर वे बोले : मैं हूं तो गुर्जर, लेकिन मैं तो हिंदू समाज से संबंध रखता हूं। मेरी जाति का उत्तरप्रदेश में हिंदूकरण हो चुका है।

किस्सा दो
पड़ोसी राज्य से आकर प्रदेश की राजनीति में अक्सर दखल देने वाले एक प्रमुख गुर्जर नेता का मामला भी जोरदार रहा। कैमरा प्रोसीडिंग में इन्होंने गुर्जर समाज को जनजाति का दर्जा देने की बात तो की, लेकिन कहा ऐसे मानो ये खुद किसी अन्य समुदाय से हैं। साफ-साफ पूछा तो बोले, खुद को जनजाति कहलाना पसंद नहीं करता। परिवार या बच्चों के लिए यह दर्जा देने की बात पूछी, तो भी वे इनकार कर गए। बोले, मैं तो उनकी बात कर रहा हूं। यानी राजस्थान के अति पिछड़े गुर्जर लोगों की।

किस्सा तीन
प्रदेश के एक प्रमुख गुर्जर नेता समिति के सामने आए तो उन्होंने गुर्जर समुदाय को जनजाति साबित करने के लिए ज्यादा तर्क नहीं दिए। सिर्फ कहा, या तो हमें भी आरक्षण दे दो या फिर आरक्षण को खत्म ही कर दो। कुछ अन्य नेताओं ने भी ज्यादा जोर अपने आपको जनजाति बनाने के बजाय या तो सिर्फ मीणाओं को ही ज्यादा फायदा मिलने या आरक्षण व्यवस्था की खामियों को समिति के सामने रखा।





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