नई दिल्ली.
चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन ने आतंकवाद विरोधी कानूनों को सांप्रदायिक रंग नहीं देने और उन पर सियासत रोकने की वकालत करते हुए कहा है कि कुछ राज्य विवादास्पद पोटा कानून के समान ही दूसरा कानून बनाने पर विचार कर रहे हैं, जिससे मानवाधिकार से जुड़ी गंभीर चिंताएं खड़ी हो गई हैं।
चीफ जस्टिस ने शनिवार को गुप्तचर ब्यूरो के अफसरों के समक्ष विशेष व्याख्यान देते हुए कहा कि यह खेद का विषय है कि मानवाधिकार हनन के मामलों पर पर्दा डाल दिया जाता है। आतंकवाद और संगठित अपराध से निपटने के लिए अपराध न्याय प्रणाली में सुधार की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि इसे ऐसा ढाला जाना चाहिए कि उससे आंतरिक सुरक्षा भी मजबूत हो सके और मानवाधिकारों की हिफाजत भी की जा सके। पोटा को लेकर चीफ जस्टिस की टिप्पणियां आंतरिक सुरक्षा परमुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के चंद दिनों बाद आई हैं। इस सम्मेलन में अनेक राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने पोटा फिर लागू करने की वकालत की थी।
चीफ जस्टिस ने कहा कि पुलिस अधिकारियों और सेना पर मानवाधिकार हनन के आरोपों के बारे में समय पर ध्यान देना चाहिए। यदि किसी पुलिस अथवा सैन्य अधिकारी पर घटना के चार-पांच वर्ष बाद आरोप लगाए जाते हैं तो उसके पीछे किसी की शह होने की पूरी आशंका रहती है।
कार्यपालिका के अधिकारों में दखल नहीं : जस्टिस बालकृष्णन ने कार्यपालिका के अधिकारों में अतिक्रमण की बात से इनकार किया है। व्याख्यान के बाद एक पत्रकार द्वारा पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा, ‘नहीं, मैं इस बात से सहमत नहीं हूं।’
क्या-क्या बोले चीफ जस्टिस
* सबसे बड़ा सवाल यह है क्या पोटा जैसे विशेष कानूनों की जरूरत भी है? क्या विकल्प के तौर पर हम न्याय प्रणाली में सुधार नहीं कर सकते?
* पंजाब और मिजोरम में सुरक्षाबल उग्रवाद पर इसलिए काबू पा सके, क्योंकि वे लोगों का विश्वास जीतने में कामयाब रहे। यही रणनीति देशभर में अपनाई जानी चाहिए।
* राष्ट्र विरोधी तत्वों से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है, लेकिन मानवाधिकारों की रक्षा हर हाल में की जानी चाहिए।
* टाडा और पोटा जैसे कानून इसलिए हटाए गए, क्योंकि सुरक्षा एजेंसियों नेइनका दुरुपयोग किया।
* अपराध न्याय प्रणाली में मानवाधिकारों का खास ख्याल रखा जाना चाहिए। यहां तक कि लंबी पूछताछ भी मानवीय ढंग से की जानी चाहिए।