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‘सेंसेक्स का 2008 में सही स्तर 16,500’

मुंबई. क्रेडिट सुइस के लिए भारत में इक्विटी रिसर्च करने वाले नीलेश जसानी को लगता है कि 2008 के अंत तक सेंसेक्स का 16,500 से ऊपर औचित्य साबित करना मुश्किल काम है।

क्यों:
जसानी की राय में परंपरागत तरीकों से भी मूल्यांकन करें तो भारतीय बाजार पहले ही काफी ऊपर तक चला गया है। इसका मूल्य व बुक वैल्यू का गुणांक काफी ज्यादा है। यह केवल मोरक्को से कम है। अगर आप 2004 से 2006 के बीच की अवधि से इसकी तुलना करें तो यह बड़ी आमदनी का सीजन नहीं होगा।

फॉरेन फैक्टर:
वर्ष 2007 में खास बात यह हुई थी कि शेयर बाजार में विदेशी मुद्रा का प्रवाह जबर्दस्त था। जसानी का कहना है कि वे लोग धन ला रहे हैं जिनके लिए धन की लागत 8 फीसदी से कम है, सरकारी बांड पर इतना ही रिटर्न मिलता है। वे रुपए की मजबूती से भी फायदा उठाना चाहते हैं।

क्या होगा:
सेंसेक्स का सही मूल्य 16,500 है, लेकिन यहां से 50 फीसदी बढ़ता है तो 24,000 पर जा सकता है। जसानी की नजर 24,000 पर है, क्योंकि सेंसेक्स तभी गिर सकता है, जब तरलता का अभाव हो। अभी तरलता की कोई समस्या नहीं है। जसानी की राय में धन बाहर नहीं जा रहा है। ‘भारत के मामले में बुनियादी घटक और सेंसेक्स अलग-अलग हो चुके हैं। अमेरिका में विकास दर कुछ कमजोर (अनुमानित 0.5-1.7 फीसदी) रहती है, तब भारत लाभान्वित हो सकता है।’

रिजर्व बैंक के आम चुनाव तक पक्ष में कदम उठाने की उम्मीद है। जसानी की राय में रिजर्व बैंक या सरकार यह नहीं कहने वाले कि विदेशी प्रवाह से अर्थव्यवस्था ज्यादा तेज हो गई है।

इस साल अचल संपत्ति की कीमतें ज्यादा नहीं बढ़ी हैं। प्राकृतिक गैस दूसरा संभावना वाला क्षेत्र हो सकता है। फिर भी किसी शेयर की कीमतों में तेजी की उम्मीद अवास्तविक आधारों पर मत लगाइए।





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