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जीत के सौदागर हैं मोदी

दृष्टिकोण.modi कांग्रेस के प्रचार और प्रहार को रद्द करके गुजरात की जनता ने मोदी को महानायक के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया है। मोदी अब जीत के सौदागर हो गए हैं। इससे पहले दोबारा जीते हुए किसी अन्य मुख्यमंत्री को इतनी महिमा नहीं मिली, जितनी मोदी को मिल रही है। इसमें शक नहीं कि देश के सभी मुख्यमंत्रियों की कतार में मोदी सबसे आगे हो गए हैं।

अनेक मुख्यमंत्री ऐसे हैं, जिनका नाम भी उनके प्रदेश के बाहर के लोग नहीं जानते, लेकिन मोदी का नाम सोनिया गांधी ने भारत के हर घर में पहुंचा दिया है। दूसरे अर्थ में मोदी के रूप में हम एक नई परिभाषा देख रहे हैं, वह है एक अखिल भारतीय मुख्यमंत्री की। तो क्या यह अखिल भारतीय मुख्यमंत्री राष्ट्रीय राजनीति और भाजपा में कोई नई लहर उठाएगा?

जहां तक भाजपा में संकट का सवाल है, मोदी अपने नए रूप में भाजपा नहीं, कांग्रेस के लिए संकट बन गए हैं। उत्तरप्रदेश में कांग्रेस बुरी तरह हारी तो कांग्रेसियों ने चूं तक नहीं किया, लेकिन गुजरात की हार वह पचा पाएगी इसमें संदेह है। यदि कांग्रेस अब भी अखिल भारतीय पार्टी की तरह गठी रहना चाहती है, तो उसे अपने नेतृत्व के प्रश्न पर विचार करने का गंभीर अवसर गुजरात ने प्रदान कर दिया है।

गुजरात ने यह भी तय कर दिया है कि देश में मध्यावधि चुनाव नहीं होंगे। यदि गुजरात में कांग्रेस जीत जाती, तो उसके हौसले आसमान छूने लगते। वह गुजरात कांग्रेस नहीं, कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व और केंद्र सरकार की विजय मानी जाती।

गुजरात के बाद सारे भारत में चुनाव होता। अब कांग्रेस पार्टी को कम्युनिस्ट पार्टियों का कहना मानना पड़ेगा। भारत-अमेरिकी परमाणु सौदा टालना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में गुजरात चुनाव ने राष्ट्रीय राजनीति को स्थिरता प्रदान की है। उसके अनिश्चितता के बादलों को छांट दिया है।

कुछ टीवी चैनलों और अखबारों ने पहले मोदी को हराने की कोशिश की और अब वे उन्हें भाजपा के संकट के तौर पर पेश कर रहे हैं। जहां तक भाजपा का सवाल है, भाजपा के दूसरी पंक्ति के अनेक नेताओं को मोदी से ईष्र्या हो, यह स्वाभाविक है। लेकिन मोदी के कारण केंद्रीय नेतृत्व को कोई खतरा हो सकता है, यह सर्वथा अकल्पनीय है। इसके कई कारण हैं- पहला, लाल कृष्ण आडवाणी मोदी के कट्टर समर्थक रहे हैं।

मोदी की जीत उनके हाथ मजबूत करेगी। दूसरे, अगर यह सही है कि मोदी संघ की पकड़ से बाहर हो गए थे, तो मानना पड़ेगा कि आडवाणी-मोदी की जोड़ी बन गई है। यानी नेतृत्व की ऐसी जोड़ी जो कि स्वायत्त रूप से काम करने के लिए छटपटा रही है, लेकिन यह गलत है। यह संदेह साजिश के तौर पर फैलाया गया है कि मोदी और संघ में 36 का आंकड़ा हो गया है।

वास्तव में मोदी संघ के लाड़ले हैं, लेकिन कुछ स्वयंसेवकों का मोदी-विरोधी हो जाना स्वाभाविक ही था, क्योंकि वे केशुभाई और सुरेश मेहता आदि बागियों के साथी रहे हैं। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व, संघ और मोदी में कहीं कोई दुराव-छिपाव नहीं है। तीसरा, संघ-भाजपा और मोदी में फूट की खबर फैलाकर गुजरात के चुनाव जीतने की रणनीति बुरी तरह से मात खा गई है, बल्कि उसका उल्टा असर हुआ है।

भाजपा के बागियों और संघ के कुछ स्वयंसेवकों को कांग्रेस ने अपने साथ जोड़कर दोतरफा नुकसान किया है। कांग्रेस और बागियों, दोनों की साख गिर गई। चौथा, गुजरात के चुनाव ने भाजपा को गुजरात में तो सशक्त किया ही है, अखिल भारतीय स्तर पर भी उसकी छवि चमका दी है।

भावी प्रधानमंत्री के तौर पर आडवाणी और पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राजनाथ सिंह की पगड़ियों में नई कलगियां चमचमाने लगी हैं। गुजरात की विजय को अलग-अलग खानों में नहीं रखा जा सकता। यह सवाल ही अपने आप में सही नहीं है कि ‘कौन जीता, मोदी या भाजपा?’ इसका सही जवाब यह है कि मोदी और भाजपा, दोनों ही जीते। मोदी ने तो पार्टी नेता के रूप में चुनाव लड़ा जबकि केशुभाई और सुरेश मेहता के लोगों ने पार्टी छोड़कर लड़ा।

व्यक्तिवादी अभियान तो उनका था। 2002 की जीत का श्रेय सांप्रदायिक तनाव को दिया गया था, लेकिन 2007 की जीत का सौदागर कौन है? अगर मोदी नहीं, तो कौन? मोदी ने विकास को अपना मुद्दा बनाया था। अगर इसी मुद्दे पर कांग्रेस उन्हें टक्कर देती, तो शायद उसे कुछ सीटें और मिल जातीं, लेकिन कांग्रेस के पास नेता और नीति, दोनों का अभाव है, यह इस चुनाव ने सिद्ध कर दिया।

केंद्र सरकार जिस 10 प्रतिशत आर्थिक प्रगति के गीत गाती है, वही काम मोदी गुजरात में कर रहे थे। खुद केंद्र सरकार का ध्यान बढ़ती हुई असमानताओं पर नहीं है, गरीबी पर नहीं है, गांवों पर नहीं है। ऐसे में वह मोदी-प्रशासन का छिद्रान्वेषण कैसे करती? खुद छलनी सूपड़े में छेद कैसे ढूंढ़ती? कांग्रेस ने पटेलों और कोलियों को पटाने का भी मोहरा चला। जैसे सांप्रदायिकता का दांव फैल हो गया, वैसे ही जातिवाद की गोटी भी गल गई। दूसरे शब्दों में, गुजरात में भाजपा की विजय स्वस्थ लोकतांत्रिकता की विजय साबित हुई।

इस घटना का हम गलत अर्थ भी लगा सकते हैं। सबसे गलत निष्कर्ष यही हो सकता है कि अब मोदी बिल्कुल निरंकुश हो जाएंगे। उन पर न तो पार्टी का और न ही संघ का कोई नियंत्रण रहेगा। ऐसा नहीं है। मोदी ने पार्टी नेतृत्व और पार्टी कार्यकर्ताओं की कहीं भी स्पष्ट अवहेलना नहीं की है। जनता में जोश जगाने के लिए यदि उन्होंने खुद को उछाला तो इसमें अनुचित क्या है?

मोदी जानते हैं कि भाजपा में व्यक्तिवाद एक सीमा तक ही चलता है। उस लक्ष्मण-रेखा को पार करने वाले लोग बलराज मधोक, सकलेचा, कल्याण सिंह और उमा भारती बन जाते हैं। चुनाव तो उन्हें गुजरात की जनता ने जिताया है, लेकिन वे मुख्यमंत्री तभी तक रह सकते हैं, जब तक कि भाजपा विधायक उनके साथ हैं।

इसके अलावा जिन विशेष कारणों और परिस्थितियों के चलते नरेंद्र मोदी गुजरात के महानायक बन गए हैं, वे सारे भारत में विद्यमान नहीं हैं। गुजरात ने मोदी को मान लिया, इसका अर्थ यह नहीं कि सारा भारत उन्हें मान लेगा। गुजराज गुजरात है और भारत, भारत।





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Prakash M Oza
Monday, 24th Dec 2007, 11:10
Modi is Non-currept C.M. he is very honesty man and Rastrawadi Neta. Hamare desh me aise neta bahut kam hai. This time the nation demand "Modi" is prime minister of India in future.