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60 की उम्र में गुजारा भत्ता

रायपुर. महाराष्ट्र में गोंदिया इलाके के मरारटोला निवासी बारीकराम मेश्राम (65 वर्ष) ने 25 साल पहले लीलाबाई मेश्राम को तलाक देकर दूसरी शादी की थी। रायपुर के पुराने राजेंद्रनगर में रहनवाली लीलाबाई ने 28 फरवरी 1986 को पति के खिलाफ भरणपोषण का मामला रायपुर एसीजेएम की कोर्ट में पेश किया। 22 साल केस लड़ने के बाद उसे न्याय मिल ही गया।

कुटुंब न्यायालय की प्रधान न्यायाधीश मैत्री माथुर ने रविवार को आदेश दिया कि बारीकराम की पेंशन से 12 सौ रुपए काटकर लीलाबाई को हर महीने दिए जाएं। केस डायरी के मुताबिक लीलाबाई तलाक के बाद से ही मायके में रह रही थी। उसने केस लगाया तो कुछ महीने बाद ही तत्कालीन एसीजेएम ने बारीकराम को निर्देश दिए कि वह लीलाबाई को गुजारे भत्ते के रूप में 300 रुपए महीना दे।

इस आदेश के बाद बारीकराम फरार हो गया। कई बात कोर्ट के निर्देश पर पुलिस उसके घर पहुंची, लेकिन वह नहीं मिला। इस वजह से इसे गुजारा भत्ता नहीं मिल पाया। बारीकराम महाराष्ट्र के सरकारी विभाग में अकाउंटेंट था। कुछ साल पहले वह रिटायर हो गया। इसके बाद लीलाबाई ने भत्ता बढ़ाकर 15सौ रुपए करने की नई अर्जी 27 जनवरी 2006 को लगाई। इसी की सुनवाई के बाद अदालत ने गुजारा भत्ता पेंशन से काटने के आदेश दिए।

जिला कोषालय से तामीली
कई बार आदेश की तामिली नहीं होने की वजह से फैमिली कोर्ट ने इस बार जिला कोषालय गोंदिया के जरिए आदेश बारीकराम तक पहुंचाया। आदेश की तामिली 12 दिसंबर 07 को हुई। रविवार को होने वाली लोक अदालत में दोनों पक्षों को उपस्थित होने का नोटिस भेजा गया। न्यायाधीश के सामने दोनों पक्ष 12 सौ रुपए भरणपोषण के लिए एक राय हुए।

50 हजार का क्लेम नहीं
फरवरी 1986 में तीन सौ रुपए के भरणपोषण के मामले में बारीक राम के खिलाफ 50 हजार रुपए का बकाया होता है। लीलाबाई ने इस पर क्लेम नहीं किया है। न्यायालय में भी इस मामले में किसी तरह लिखित स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक बारीक राम रिटायर हो चुका है और उसकी माली हालत भी माकूल नहीं है।





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