जालंधर. बिजली बोर्ड को आर्थिक संकट से निकालने के लिए बनाई गई नई रणनीति बोर्ड को उलटी पड़ सकती है। बोर्ड ने पिछली सिक्योरिटी पर बनते ब्याज की अदायगी तो क्या करनी थी, अब नए सिरे से नए सप्लाई कोड के तहत करोड़ों रुपए जुटाने की योजना बनाई है। अगर बोर्ड को पिछली ब्याज राशि देनी पड़ी तो उसे लेने के देने पड़ जाएंगे।
बिजली बोर्ड ने उपभोक्ताओं की करोड़ों रुपए की सिक्योरिटी दबा रखी है, जिस पर 1959 से ब्याज की भी अदायगी नहीं की। नियमों के मुताबिक बोर्ड को हर साल उपभोक्ताओं को उनकी जमा सिक्योरिटी पर ब्याज देना होता है।
बोर्ड ने पहला ब्याज तो दिया नहीं अब नए सप्लाई कोड के तहत दोबारा सिक्योरिटी वसूलने की तैयारी कर रहा है, जिसके खिलाफ उद्यमी एकजुट हो गए हैं और बोर्ड से पहले जमा सिक्योरिटी का हिसाब मांगा है।
नैशनल इलैक्ट्रिसिटी कन्जयूमर एसोसिएशन के जनरल सैक्रेटरी विजय तलवाड़ ने कहा है कि बोर्ड ने उपभोक्ताओं को जमा सिक्योरिटी पर 1959 से 1978 तक चार फीसदी और 1978 से 1985 तक आठ फीसदी ब्याज देना है, जो हर साल अप्रैल के बाद अगले बिल में एडजस्ट होना था।
2003 में एक्ट लागू होने के बाद से अब (दिसंबर 2007) तक बोर्ड ने उपभोक्ताओं को 12.75 फीसदी (पब्लिक लैंडिंग रेट्स) के हिसाब से ब्याज देना है, जिसकी अदायगी बोर्ड ने नहीं की। नियमों में बदलाव कर बोर्ड ने 1985 के बाद सिक्योरिटी पर ब्याज का प्रावधान ही हटा दिया था, जो कि 2003 में इलैक्ट्रिसिटी एक्ट लागू होने से पहले तक जारी रहा।
तलवाड़ ने मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और बोर्ड के चेयरमैन वाई.एस रतड़ा से मांग की है कि नई सिक्योरिटी की वसूली से पहले उपभोक्ताओं को बताएं की बिजली बोर्ड के पास उनकी कितनी राशि (सिक्योरिटी और ब्याज) पड़ी है।
तलवाड़ का कहना है कि सब डिवीजनों के पास उपभोक्ताओं की बोर्ड के पास पड़ी राशि का हिसाब-किताब नहीं है। पंजाब आईस फैक्टरी एंड कोल्ड स्टोरेज वैल्फेयर एसोसिएशन के चेयरमैन और एडवोकेट पूरन चंद अरोड़ा का भी कहना है कि बोर्ड को उनकी सिक्योरिटी पर ब्याज का हिसाब-किताब देना चाहिए।
नए कोड के तहत जमा राशि का देना है ब्याज बोर्ड के जालंधर सर्किल के एसई के.बी.एस कलेर का कहना है कि बोर्ड ने नए सप्लाई कोड के तहत जमा होने वाली सिक्योरिटी पर उपभोक्ताओं को ब्याज देना है। पहले की जमा सिक्योरिटी पर कोई ब्याज नहीं देना है।
पहले जमा और अब मांगे जाने वाली सिक्योरिटी की तुलना उपभोक्ताओं का कहना है कि सप्लाई कोड के तहत उनकी तरफ बनती सिक्योरिटी की तुलना उपभोक्ताओं की बोर्ड के पास पड़ी सिक्योरिटी ( ब्याज समेत) से की जाए।
अगर बोर्ड के पास पहले ही जमा सिक्योरिटी की राशि उनकी दो महीने (इंडस्ट्रियल और कमर्शियल कनैक्शन के केस में) या आम उपभोक्ताओं के केस में तीन महीने के बिल की राशि से ज्यादा बनती है, तो यह उन्हें लौटाई जाए। अगर पहले जमा सिक्योरिटी (ब्याज समेत) सप्लाई कोड के तहत मांगी जाने वाली राशि से कम बनती है, तो फिर बोर्ड उसके हिसाब से वसूली करे।
सिक्योरिटी पर बढ़ता ब्याज विजय तलवाड़ के मुताबिक हर साल सिक्योरिटी पर बनते ब्याज की अदायगी न होने के कारण ब्याज प्रिंसीपल में जुड़ता रहा और फिर उस राशि (प्रिंसीपल अमाउंट) पर ब्याज लगा। इस तरह सिक्योरिटी की ही राशि कई गुना बढ़ चुकी है। बिजली बोर्ड के इस समय 60 लाख से ज्यादा उपभोक्ता हैं।
एक अनुमान के मुताबिक अगर एक उपभोक्ता के एक हजार रुपए भी बोर्ड के पास सिक्योरिटी के तौर पर जमा हैं तो बोर्ड के पास कम से कम 6 सौ करोड़ रुपए सिक्योरिटी राशि पड़ी है, जबकि उद्यमियों के बोर्ड के पास बतौर सिक्योरिटी लाखों रुपए जमा हैं।
उद्यमियों से दो महीने का बिल सप्लाई कोड के लागू होने पर बोर्ड ने उद्यमियों से दो महीने के बिल और आम उपभोक्ताओं (जिनका बिल साईकल दो महीना का है) से तीन महीने के बिल की बतौर सिक्योरिटी वसूल करनी है।