नई दिल्ली. तेजी से हो रहे आर्थिक विकास की सबसे ज्यादा कीमत आदिवासियों को चुकानी पड़ी है। एक शोध के अनुसार हाल के वर्षों में स्थापित उद्योगों के कारण विस्थापन के शिकार आदिवासियों का आंकड़ा 80 फीसदी हो गया है।
अंतरराष्ट्रीय संस्था एक्शन एड और इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए इस शोध के अनुसार, विस्थापित आदिवासियों में से करीब 66 फीसदी का पुनर्वास नहीं हो पाया है। प्रचुर प्राकृतिक संसाधन वाले चार राज्यों आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और उड़ीसा में पिछले दस वर्र्षो में उद्योगों के लिए करीब 10 लाख बीस हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया। इसके चलते करीब 14 लाख लोग विस्थापित हुए।
बढ़ाई परेशानी :
शोध में पाया गया कि नए स्थानों पर बसे आदिवासी किसी तरह फिर से जंगलों में बसना चाहते हैं। उजड़ने और फिर बसने के दौरान उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस दौरान कई लोगों की भूख और बीमारी के कारण मौत भी हुई है।
पहचान कायम रखने का संकट :
शोध के अनुसार नए स्थानों पर भाषा और संस्कृति को कायम रखने का संकट तो है ही, नई जीवनशैली को अपनाने का काम भी कष्टभरा होता है। आदिवासियों के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बने कानूनों के बाद भी दस्तावेजों आदि के अभाव में कई लोग मुआवजे से वंचित हो जाते हैं।
यह भी ..
* 86 फीसदी विस्थापितों ने उन्हें उनके मूल स्थान से हटाए जाने का विरोध किया था।
* सबसे ज्यादा विस्थापन बांधों के कारण हुआ है। खनन परियोजनाओं के कारण भी बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित किया गया है।
* सबसे ज्यादा जमीन झारखंड में अधिगृहीत की गई, जबकि सबसे कम छत्तीसगढ़ में।