अभिमत. क्रिसमस का संबंध अब सिर्फ ईसाई समुदाय से ही नहीं रहा, हममें से कई लोग अपने घरों को क्रिसमस ट्री से सजाना चाहते हैं, अच्छा खाना खाकर अपने बच्चों को ऐसी दुकानों में ले जाना चाहते हैं जहां सांता क्लाज बच्चों को तोहफे बांटते हैं। दफ्तरों में बड़े दिन की पार्टियां होने लगी हैं।
ऐसे देश में जहां हमें चिंता लगी रहती है कि विदेशी संस्कृति हम पर बुरा असर डाल रही है, क्रिसमस का धर्मनिरपेक्षीकरण न सिर्फ ईसाइयत, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति की मजबूती के लिए भी बेहतर है। ईसाइयत के साथ भारत का रिश्ता काफी पुराना है। यहां संत थॉमस ने ईसवी सन 52 में इस धर्म से परिचित कराया था। उसके बाद भारत में चारों तरफ यह धर्म फैला।
हालांकि कुल आबादी में ईसाई समुदाय लगभग ढाई प्रतिशत ही है, मगर भारत में इसका प्रभाव कई अन्य रूपों में नजर आता है। देश के महानगरों, छोटे कस्बों से लेकर दूरदराज उत्तर-पूर्व तक मिशनरी स्कूल मौजूद हैं।
यहां से कई पीढ़ियां प्रेयर बोलते हुए निकल गईं, मगर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के हिमायतियों को विरला ही कोई मिलेगा जिसने ईसाई धर्म अपनाया हो। धार्मिक शिक्षा की कक्षा में उपस्थित रहने के लिए कभी जोर नहीं दिया गया और न ही कक्षा में कभी धर्म प्रचार किया गया।
ग्लोबलाइजेशन की वर्तमान लहर की देन हाई-प्रेशर मार्केटिंग और नए अंतरराष्ट्रीय ट्रेंड्ज की बदौलत क्रिसमस दुनियाभर में एक बड़ा कारोबारी त्योहार बन चुका है। नास्तिक चीन से लेकर इस्लामी देश दुबई तक ‘सांता इन ए मॉल’ गीत एक जैसा ही बजता है।
दुनिया में एक नया बदलाव यह भी आया है कि ईसाई बहुल देशों में भी बच्चों को अन्य संस्कृतियों के बारे में सीखने और दिवाली जैसे अन्य त्योहारों के बारे में समझने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। कम से कम त्योहारों के मामले में तो कहा ही जा सकता है कि दुनिया बहुसंस्कृतिवान होती जा रही है।