जन्मदिन आज.
अटलबिहारी वाजपेयी देश के ऐसे जननेता हैं जिन्होंने लगभग आधी शताब्दी तक अपनी वाणी के ओज से लोगों के मन को झकझोरा है, पहले जनसंघ फिर भाजपा के कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास का भाव भरा है, अपने अकाट्य तर्को से विरोधियों को घेरा है।
जब अटलजी संसद में आए उस समय संसद विभिन्न पार्टियों के दिग्गज नेताओं तथा प्रखर वक्ताओं से भरी हुई थी किंतु अपनी अनूठी वक्तत्व शैली के बल पर अटलजी ने उन नेताओं के बीच अग्रणी स्थान बना लिया। उनका स्वर संसद और सड़क दोनों पर समान रूप से गूंजने लगा। इसीलिए वह कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदुस्तानियों के दिलों में बस गए हैं।
पचास वर्षो तक सक्रिय राजनीति में रहकर अपनी छवि को बेदाग बनाए रखना आसान नहीं है किंतु अटलजी ने यह करके दिखाया है। भाजपा की विचारधारा से समझौता किए बिना उन्होंने विरोधियों को मोहित किया है।
एक बार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने अपने भाषण के दौरान चुटकी लेते हुए अटलजी को संबोधित करते हुए कहा था, ‘अटलजी, आप व्यक्ति तो ठीक हैं मगर गलत पार्टी में हैं। ‘अटलजी कहां चूकने वाले थे। उन्होंने तुरंत पलटवार करते हुए कहा, ‘मैं व्यक्ति भी ठीक हूं, मेरी पार्टी भी ठीक है किंतु आपकी नजर गलत है, आप अपने दृष्टिदोष को सुधार लें तो सब कुछ ठीक-ठीक दिखने लगेगा।’
अटलजी ने जहां प्रतिपक्ष के नेता के रूप में एक सजग प्रहरी की भूमिका सफलता से निभाई वहीं प्रधानमंत्री के रूप में एक दूरदर्शी प्रशासक की भूमिका भी बहुत कुशलता से निभाई। अटलजी की दृष्टि बेहद विकासोन्मुख है।
एनडीए का शासनकाल इसका साक्षात उदाहरण है। मुझे तो व्यक्तिगत रूप से इसका अनुभव उस समय हुआ जब स्वास्थ्य मंत्री के रूप में मैं एम्स की तर्ज पर छह नए एम्स अस्पताल खोलने का प्रस्ताव लेकर उनके पास गई।
दसवीं पंचवर्षीय योजना को बने तब तक एक वर्ष बीत गया था और यह प्रस्ताव उस योजना का हिस्सा नहीं था। आमतौर पर इतनी बड़ी राशि का कोई नया प्रस्ताव योजना में जुड़ नहीं पाता किंतु जब मैंने अटलजी से इस प्रस्ताव की चर्चा की, तो उन्होंने आश्चर्यचकित दृष्टि से मेरी ओर देखकर पूछा, ‘इतना बड़ा काम कर पाओगी।’ मैंने कहा, ‘आपका आशीर्वाद मिलेगा, तो जरूर कर पाऊंगी।’
वे तुरंत बोले, ‘विकास के हर अच्छे काम के लिए मेरा आशीर्वाद है, आगे बढ़ो।’ और इसी का परिणाम था कि मेरे एक वर्ष के कार्यकाल में सभी छह एम्स के लिए हमें योजना आयोग से सैद्धांतिक मंजूरी भी मिल गई।
वित्त मंत्री ने इस योजना के लिए अलग से बजट हेड भी बना दिया और छहों एम्स का शिलान्यास होकर चारदीवारी भी बन गई। पहले एम्स का शिलान्यास तो भुवनेश्वर में अटलजी ने स्वयं किया।
लोकतंत्र में अटलजी की अत्यंत गहरी निष्ठा है। मुझे इसका अनुभव अपने संसदीय कार्यमंत्री होने के नाते उस समय हुआ, जब इराक में सेना न भेजने के संबंध में प्रतिपक्षी दलों ने दोनों सदनों में एक प्रस्ताव पारित किए जाने की मांग रखी और संसद की कार्यवाही बाधित की। इराक में सेना न भेजने पर तो एनडीए में सबकी सहमति थी किंतु ऐसा प्रस्ताव पास किया जाए, इसको लेकर सहमति नहीं बन रही थी।
जब मैंने संसदीय कार्य मंत्री के नाते उनसे इस विषय में बात की, तो उन्होंने सभी वरिष्ठ मंत्रियों को बुलाकर कहा- जब हमने तय कर लिया है कि हम इराक में सेना नहीं भेजेंगे तो प्रस्ताव पारित करने में क्या आपत्ति है। कुछ मंत्रियों ने कहा- इससे लगेगा कि सरकार प्रतिपक्ष के आगे झुक गई।
उस समय अटलजी के कहे शब्द मेरे कानों में आज भी जस के तस विद्यमान हैं। अटलजी ने कहा था- ‘प्रतिपक्ष की बात मानना लोकतंत्र का द्योतक है, झुकने का परिचायक नहीं। इस प्रक्रिया से लोकतंत्र मजबूत होता है।’
उनकी यह निष्ठा पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र के संबंध में भी बहुत बार उजागर हुई। अपनी बात दृढ़ता से कह देने के बाद भी यदि बहुमत उनसे भिन्न मत का बना तो उन्होंने उसे माथे पर शिकन डाले बिना सहर्ष स्वीकार किया।
अटलजी ने पार्टी की नैया उस समय खेने का काम किया जब जनसंघ या भाजपा को कोई बहुत गंभीरता से नहीं लेता था। यह पार्टी कभी सत्ता में आएगी, कोई सोचता भी नहीं था। किंतु अटलजी के नेतृत्व में भाजपा सर्व स्वीकार्य पार्टी बनी।
आज देश के राजनीतिक धरातल पर उभरी हुई पार्टियों में से कई किसी न किसी समय एनडीए के घटक दल के रूप में भाजपा की सहयोगी पार्टी रही हैं और अटलजी ने भाजपा की नैया को बहुत सफलता से खेने का काम किया है।
भाजपा का सौभाग्य है कि उसे इतने जनप्रिय, इतने अनुभवी और इतने सुयोग्य व्यक्तित्व का आशीर्वाद प्राप्त है। अटलजी के जन्मदिन के शुभ अवसर पर मैं ईश्वर से यह प्रार्थना करती हूं कि वह उन्हें दीर्घायु और बहुत अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करे।
लेखिका राज्यसभा में भाजपा संसदीय दल की उपनेता हैं।