Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
पश्चिम में क्राइस्ट और बाइबिल पर आधारित अनेक फिल्में बनी हैं। यहां तक कि उनकी भूतों वाली सुपरनेचुरल फिल्मों में भी क्राइस्ट के प्रभाव का इस्तेमाल जमकर हुआ है। उनकी फिल्मों में ‘होली वॉटर’ से प्रेतात्माएं भाग जाती हैं। एक फिल्म में एक शैतान पर चर्च की छत से क्रॉस गिरता है। एक बच्चे की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए क्रिसमस के महीनों पूर्व सारा मोहल्ला क्रिसमस मनाता है।
सैटेलाइट चैनल ‘एचबीओ’ पर एक फिल्म में भूख से लड़ने के लिए एक बेवड़ा सांता क्लाज की भूमिका करते हुए लक-दक बाजार में अपनी नौकरी करते हुए एक मकान में अकेले बच्चे को लूटने पहुंच जाता है, परंतु आत्मा की आवाज पर दुष्कर्म से बच जाता है। सांता क्लाज का अभिनय करने वालों का भी अपना दर्द होता है।
हिंदुस्तानी सिनेमा अपने शैशव काल से ही हॉलीवुड से विचार और तकनीक उठाता रहा है। अत: हमारे फिल्मकारों ने भी अपनी फिल्मों में क्रिश्चियन प्रतीकों का भरपूर इस्तेमाल किया है और गांव तथा कस्बों तक के दर्शक उन प्रतीकों का अर्थ समझते हैं। इस तरह क्रिश्चियन मुहावरे का संपूर्ण भारतीयकरण हो चुका है। सिनेमाई भाषा सभी सरहदों के पार जाती है। गुरुदत्त की पैदाइशी उदासी और नैराश्य भी क्रिश्चियन प्रतीकों द्वारा ‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ में प्रस्तुत हुआ है।
‘प्यासा’ के क्लाइमैक्स में ऑडिटोरियम के दरवाजे पर नायक का खड़ा होना कुछ इस तरह चित्रित हुआ है, मानो क्राइस्ट को सूली पर चढ़ाया जा रहा है। राज कपूर की ‘जागते रहो’ में भी पाइप पर लटके गंवई गांव के नायक को पत्थर लगता है और शीशे के टूटते ही कैमरे कमरे की दीवार पर लगे क्राइस्ट की छवि पर सांस रोके ठिठक जाता है। ऋषिकेश मुखर्जी की ‘मेम दीदी’ में ललिता पवार ही केंद्रीय भूमिका में प्रस्तुत हैं। दरअसल यह भूमिका उनके द्वारा प्रस्तुत ‘अनाड़ी’ की क्रिश्चियन महिला का ही विकसित स्वरूप है।
राज कपूर की ‘मेरा नाम जोकर’ का पहला भाग तो हिंदुस्तानी विदूषक द्वारा प्रस्तुत क्रिश्चियन कैरोल ही लगता है। भारतीय क्रिश्चियन पर सबसे अधिक विश्वसनीयता प्रदान करने वाली मनोरंजक फिल्म थी ‘जूली’, जिसमें नादिरा और ओमप्रकाश ने कमाल का अभिनय किया था। अकेलेपन का श्रद्धा गीत अपर्णा सेन की ‘36 चौरंगी लेन’ एक महान फिल्म है। इसे हर क्रिसमस पर देखा जा सकता है। मनकों की माला की तरह दोहराया जा सकता है।
भारतीय फिल्म संगीत में पहले चरण से ही गोवा के क्रिश्चियन वादकों का वर्चस्व लंबे समय तक रहा, जिसके कारण मुखड़े और अंतरे के बीच के इंटरल्यूड में क्रिश्चियन ध्वनि सुनने को मिलती रही है। पश्चिमी स्वर लिपि में ही सारा हिंदुस्तानी फिल्म संगीत लिखा जाता है। क्राइस्ट के जीवन के कुछ वर्षो की किसी को जानकारी नहीं है, अत: उन वर्षो में उनकी भारत यात्रा की किंवदंती पर हॉलीवुड में फिल्म बनाने की योजना है। भारतीय सिनेमा में क्रिश्चियनिटी स्थापित तथ्य है, जिसे दर्शक की अखिल भारतीय स्वीकृति प्राप्त है।