नई दिल्ली.रक्षा खरीद सौदों को लेकर समय-समय पर उठने वाले विवादों का साया अब आम्र्ड फोर्सेज के मॉर्डनाइजेशन पर भी पड़ने लगा है। दलाली के आरोपों के चलते रक्षा खरीद प्रक्रिया इतनी धीमी पड़ गई है कि पिछले पांच साल में बजटीय आवंटन की 21 हजार करोड़ रुपए की राशि खर्च ही नहीं की जा सकी है।
रक्षा विशेषज्ञों और अधिकारियों के मुताबिक, फंड ‘लैप्स’ होने की वजह से कई रक्षा सौदे फिलहाल अधर में हैं। रक्षा खरीद विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि सौदों को अंतिम रूप देने में थोड़ी चूक हुई है। हालांकि उन्होंने कहा कि खरीद प्रक्रियाओं में लंबा समय लगता है। इसकी वजह से भी कई बार खर्च में अंतराल रखने की समस्या का सामना करना पड़ता है, जिससे फंड ‘लैप्स’ हो जाता है।
नियम :
वित्तीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन एक्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष खत्म होने के बाद बची धनराशि वित्त मंत्रालय को लौटा दी जाती है। यह धनराशि फिर अगले वर्ष के बजट से हटा दी जाती है। फ्रांस स्थित यूरोपियन एअरोनॉटिक डिफेंस एंड स्पेस कंपनी से यूरोकॉप्टर का सौदा रद्द होने से इसके लिए आवंटित 17,000 करोड़ की राशि भी लैप्स हो सकती है।
समाधान? :संसदीय स्थायी समिति ने सुझाव दिया है कि रक्षा मंत्रालय को खरीद की सभी प्रक्रियाएं सितंबर तक पूरी कर लेनी चाहिए, जिससे बजट लैप्स न हो। पूर्ववर्ती एनडीए सरकार ने 25 हजार करोड़ रुपए का नॉन लैप्सेबल फंड बनाने का फैसला भी किया था। हालांकि उसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका।
कितनी राशि खर्च नहीं हुई
वर्ष राशि (करोड़ में)
2002-03 9,000
2003-04 3,000
2005-06 1,300
10 वीं योजना में कुल राशि(2002-07) 21,000
समस्या पुरानी है। योजनाओं को बनाने और उनके क्रियान्वयन में समय का बड़ा अंतर है। सेनाओं को इसका खामियाजा उठाना पड़ रहा है। इसके लिए खरीद प्रक्रिया ही जिम्मेदार है।
—वीपी मलिक, पूर्व सेना प्रमुख
यह सही है कि दलाली के आरोपों में फंसने के डर से भी कई बार रक्षा खरीद में विलंब हो जाता है’।
—जसजीत सिंह, इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज के पूर्व निदेशक