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तस्लीमा पर बसु का अंदाज-ए-बयां

अभिमत. विवादास्पद बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन के बारे में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पुरोधा ज्योति बसु की ताजा टिप्पणी पार्टी के आधिकारिक दृष्टिकोण से कुछ हटकर जरूर है लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इस पर अमल आसान नहीं है। बसु ने कहा है कि यदि तस्लीमा कोलकाता या पश्चिम बंगाल के किसी और स्थान पर लौटना चाहती हैं तो उनका स्वागत है, मगर उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्र को लेनी होगी।

सवाल उठता है कि संविधान के प्रावधानों के मुताबिक जब कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है तब तस्लीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्र कैसे ले सकता है। फिर यहां केवल तस्लीमा की सुरक्षा की बात नहीं है। कुछेक सुरक्षा प्रहरी तैनात कर उनकी सुरक्षा का बंदोबस्त तो किया भी जा सकता है, मगर उनकी मौजूदगी के कारण कोलकाता या राज्य के दूसरे किसी स्थान पर उठने वाली कानून-व्यवस्था की समस्या से तो राज्य को ही निपटना होगा। इसके लिए राज्य केंद्र से अतिरिक्त केंद्रीय सुरक्षा बल भले ही मांग सकता है पर अपनी जिम्मेदारी उस पर कतई नहीं डाल सकता।

बसु ने पहली बार तस्लीमा के साथ हमदर्दी जताकर और कोलकाता में उनकी वापसी की भूमिका बनाकर अपनी पार्टी के अन्य नेताओं से अलग रुख जरूर अपनाया है लेकिन इसे टालमटोल के उपक्रम से आगे बढ़कर नहीं देखा जा सकता है। ज्योतिबाबू का बयान कमोबेश मुस्लिम तुष्टीकरण का ही हिस्सा है जो कई कारणों से माकपा से बुरी तरह नाराज चल रहे हैं। उन्होंने तस्लीमा नसरीन के मामले में विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी के संसद में दिए बयान की सराहना करके खुद को केंद्र सरकार के साथ खड़ा दिखने की कोशिश भी की है, मगर जब तक प. बंगाल की वाममोर्चा सरकार ठोस पहल नहीं करती तब तक तस्लीमा की कोलकाता वापसी संभव नहीं है। दूसरे शब्दों में, तस्लीमा की कोलकाता वापसी पूरी तरह से राज्य सरकार के रुख पर निर्भर है, जो फिलहाल ऐसी कोई पहल करती नजर नहीं आ रही है।





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