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Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़.प्लेयर्स का स्टेमिना, जुनून और पैंतरों के साथ अब हॉकी ग्राउंड पर दबदबा कायम करने में लैपटॉप और वॉकी-टॉकी अपनी खास भूमिका निभा रहे हैं। विपक्षी टीम कहां भारी पड़ रही है और हम कहां कमजोर? टेक्निकल टीम तुरंत कोच को इसका मेसेज करती है और कोच उसके मुताबिक प्लेयर्स को निर्देश देते हैं। यह सब कुछ संभव हो रहा है एक खास किस्म के सॉफ्टवेयर ‘ड्रेग फिल्किर’ से। यानी भारतीय हॉकी भी अब हाईटेक हो गई है।
सेक्टर-42 के हॉकी स्टेडियम में चल रहे पीएचएल के मैचों में इसका बखूबी इस्तेमाल हो रहा है और इसे अंजाम दे रही है तकनीकी टीम। इस टीम में भारतीय हॉकी टीम के वीडियो एनालिसिस प्रसन्ना, रामेश्वरन और सहायक कोच एमपी सिंह शामिल हैं। प्रसन्ना इससे पहले भारतीय क्रिकेट टीम के वीडियो एनालिसिस विशेषज्ञ रह चुके हैं। टीम में कोच, ट्रेनर के अलावा अब एक तकनीकी टीम भी जरूरी है जो खिलाड़ियों को उनकी गलतियों और दूसरी टीमों के वीक पॉइंट के बारे में लैपटॉप के जरिए बता सकें।
यह तकनीकी टीम ड्रेग फिल्किर नाम के एक सॉफ्टवेयर के जरिए इंटरनेशनल मैचों के दौरान टीम की मदद करती है। सहायक कोच एमपी सिंह ने कहा, यूरोपियन देशों में हॉकी कोच अपने-अपने सॉफ्टवेयर यूज कर कर रहे हैं, लेकिन भारतीय हॉकी में इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। तकनीकी टीम के सदस्य रामेश्वरन ने बताया कि यूरोपियन देश स्पोर्ट्स कोड नाम के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हैं।
इस तरह होता है यूज :
इसका प्रयोग हाल ही में सुल्तान अजलनशाह हॉकी टूर्नामेंट में भारतीय टीम ने किया था। उसके बाद एशिया कप में भी इसे प्रयोग में लाया गया। मैच के दौरान एक वॉकी टाकी तकनीकी टीम के पास और एक कोच के पास रहती है। यह टीम लैपटॉप पर देखकर बताती है लेफ्ट या राइट साइड से टीम पर ज्यादा अटैक हो रहे हैं। यह मैसेज वॉकी टॉकी के जरिए कोच तक पहुंचता है और उसके बाद कोच अटैक को ब्लॉक करने के लिए खिलाड़ी को कहता है। इसके अलावा विदेशी टीमों की मैच रिकॉर्डिग को खिलाड़ियों को दिखाया जाता है और उनके वीक पॉइंट्स डिस्कस किए जाते हैं।