दृष्टिकोण. गुजरात में दूसरे चरण के मतदान के दौरान एक कांग्रेसी नेता ने एक टीवी चैनल के प्रमुख को फोन करके कहा, ‘सुबह से आपका चैनल मतदान केंद्रों के
बाहर लगी बुर्कानशीं मुस्लिम महिलाओं की लंबी-लंबी कतारें दिखा रहा है।’ चैनल प्रमुख ने उक्त कांग्रेसी नेता को बधाई देते हुए कहा, ‘यह तो अच्छी बात है। इससे तो लगता है कि आपकी पार्टी गुजरात में अच्छा प्रदर्शन करने जा रही है।’ इस पर घबराई आवाज में उक्त कांग्रेसी नेता ने जवाब दिया, ‘नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है। मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि आप इस फुटेज का प्रसारण तत्काल बंद करवा दें।’ इस अजीब मांग से भ्रमित टीवी चैनल प्रमुख ने कांग्रेसी नेता से उतनी ही घबराहट में पूछा, ‘क्यों? मुझे तो लगता है कि मुस्लिम मतदाताओं का रुझान मोदी की बजाय कांग्रेस की ओर है?’ इस पर लगभग चिल्लाते हुए उक्त नेता ने कहा, ‘बिल्कुल सही कहा है आपने, लेकिन इस फुटेज का गलत संदेश जा रहा है। यह हमें नुकसान पहुंचा रहा है। मतदान केंद्रों के बाहर मुस्लिम मतदाताओं की कतारें देख प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू भी मोदी को जिताने के लिए मतदान केंद्रों पर भारी संख्या में उमड़ पड़े हैं।’
सिफोलॉजिस्ट और अंग्रेजी पत्रकारों की नई फौज की तरह ही यह कांग्रेस नेता भी संभवत: हकीकत को पहचान नहीं पा रहे थे। पिछले 60 वर्षो से अल्पसंख्यकों के भय से खेलने की मनोविकृति की शिकार पार्टी के उक्त कांग्रेसी नेता का भी यही मानना था कि दोनों परस्पर विरोधी संप्रदाय एक ही तरह से व्यवहार करते हैं। जो कारण बहुसंख्यकों के व्यवहार का निर्धारण करते हैं वे अल्पसंख्यकों के व्यवहार के कारणों के संदर्भ में सर्वथा अलग होते हैं।
हकीकत है कि धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण होने को उन्होंने सच माना। वे शायद नहीं जानते कि भारत के 85 फीसदी हिंदुओं में एकीकरण कभी हुआ ही नहीं। अगर ऐसा हुआ होता तो आज भाजपा विपक्ष में नहीं होती। उन्हें यह भी नहीं मालूम है कि सामाजिक उत्थान के प्रयास पवित्र और शुद्ध होते हैं। जबानी जमा-खर्च ने मुस्लिमों का कुछ भी भला नहीं किया है। यही वजह है कि अब बहुसंख्यक तो ऐसे जबानी जमा-खर्च को नकारने लगे ही हैं, अल्पसंख्यक भी अब ऐसे प्रयासों की धज्जियां उड़ाने लगे हैं।
अगर इरादे नेक और साफ होते तो मुसलमान सरकारी नौकरियों में अपने वास्तविक हक से वंचित नहीं रहते। सच्चर समिति की रिपोर्ट कांग्रेस का असली चेहरा उजागर करती है। उसके मुताबिक सरकारी नौकरियों में सिर्फ 4.9 फीसदी मुसलमान हैं और प्रशासनिक सेवाओं में उनका प्रतिशत सिर्फ 3.2 है। धर्मनिरपेक्षता के इन तथाकथित झंडाबरदारों के दशकों तक शासन करने के बावजूद इस समुदाय के रहन-सहन और जीवनशैली में खास फर्क नहीं पड़ा।
गुजरात का ही मामला लें। 1995 से 2007 के बीच हुए पिछले चार विधानसभा चुनावों में कभी भी कांग्रेस और भाजपा को प्राप्त मतों का अंतर 10 प्रतिशत से कम नहीं रहा। इस बार भी यह अंतर 11 फीसदी रहा है। खासकर जब पूरा चुनाव बगैर किसी सांप्रदायिक बयार के लड़ा गया हो। गुजरात की कुल आबादी के दसवें भाग से भी कम हैं मुसलमान और 1995 से लगभग हर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 40 फीसदी मत ही मिले हैं। 1995 में जरूर कांग्रेस को 32 और भाजपा को 42 फीसदी मत मिले थे। इसका सीधा अर्थ है कि करीब 30 फीसदी हिंदू कांग्रेस को भी मत देते आए हैं। ऐसे में कतई नहीं कहा जा सकता कि हिंदू सांप्रदायिक मानसिकता से मतदान करते हैं।
अब आंखें खोलने वाला एक और तथ्य- ‘कथित’ हिंदू ‘एकीकरण’ के लगभग दो दशक या बाबरी विध्वंस और गोधरा कांड के बाद लड़े गए छह लोकसभा चुनावों में हिंदुत्ववादी भाजपा को जितने वोट मिले, वे कांग्रेस को मिले वोटों से अधिक नहीं थे। इससे पता चलता है कि समाज के अधिकांश हिस्से ने कभी भी पूरी तरह से सांप्रदायिक आधार पर मतदान नहीं किया। वस्तुत: अधिकांश हिंदू उदार हैं और आक्रामक हिंदुत्व को खारिज करते हैं। यदि 2002 के चुनाव में हिंदू मतदाता अत्यधिक सांप्रदायिक हो गए होते तो कांग्रेस को 39 तथा भाजपा को सिर्फ 49.5 प्रतिशत वोट नहीं मिले होते। हालांकि यह बात सच है कि लोकसभा चुनावों में पिछले कुछ दशकों से भाजपा का ग्राफ राष्ट्रीय स्तर पर उछाल खाते हुए दो प्रतिशत के नगण्य आंकड़े से 1999 में सर्वाधिक 25.63 प्रतिशत तक पहुंच गया। 1998 से पिछले चार लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा को हमेशा कांग्रेस से तीन फीसदी कम ही वोट मिले। भाजपा को वोटों का इतना बड़ा हिस्सा मिलने के पीछे भी कारण अधिक लोगों का सांप्रदायीकरण नहीं बल्कि विवेकपूर्ण प्रतिक्रिया है।
कांग्रेस द्वारा चार दशक के निर्बाध ‘टोकनवाद’ से मुसलमानों की हालत में कोई सुधार नहीं आया है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से बजाय किसी अन्य राजनीतिक पार्टी के, कांग्रेस को ही अधिक सबक लेने की जरूरत है। केंद्र और राज्यों में कांग्रेस शासन के चार दशकों के दौरान मुस्लिमों को विकास की मुख्यधारा में क्यों नहीं लाया गया? इरादे नेक हों तो किसी सरकार के लिए 13.4 प्रतिशत आबादी की दशा सुधारने के लिए छह दशक का समय पर्याप्त लंबी अवधि है। मगर मुसलमानों के लिए सचमुच कुछ करने की बजाय मकसद था यह सुनिश्चित करना कि अल्पसंख्यक समाज का भयभीत और घिरा हुआ हिस्सा बने रहें जिन्हें समाज का सुशिक्षित और चमकदार अंग बनाने की बजाय सिर्फ चुनावों के दौरान ही बाहर निकाला जाए।
कांग्रेस नेताओं को समझना चाहिए कि मतदाताओं की कतार में किसी मुस्लिम महिला के खड़े होने का दृश्य जैसे ही टीवी पर बताया जाता है, ‘अन्य’ मतदाता प्रतिक्रिया क्यों व्यक्त करते हैं। जैसे ही वे इस बात को समझ लेंगे, मोदियों की पूछ-परख कम हो जाएगी। आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि एक खामोश प्रतिक्रिया के रूप में गुजरात के मतदाताओं ने (कांग्रेस के लिए सांप्रदायिकता से प्रेरित मतदाताओं ने) इस तरह का व्यवहार किया है। कांग्रेस नेताओं को यह अहसास भी होना चाहिए कि राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा ही मानस बन जाने की आशंका है। इसका मतलब यह हुआ कि भाजपा को अब मंदिर जैसे सांप्रदायिक मुद्दे उछालकर जनभावना भड़काने की जरूरत नहीं है। पार्टी के नेता जनता से सिर्फ इतना ही कहेंगे कि- ‘जनजातियों (8.2 प्रतिशत), अनुसूचित जातियों (19 प्रतिशत) या ग्रामीण गरीबों जैसे वंचितों की अनदेखी करते हुए केंद्र द्वारा आवंटित राशि में से 15 प्रतिशत अल्पसंख्यक कल्याण पर खर्च करने का फैसला कांग्रेस ने किया है।’