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परमाणु बिजलीघर के पानी को क्लीन चिट

उदयपुर. चित्तौड़गढ़ जिले की राणा प्रताप सागर झील किनारे स्थित राजस्थान परमाणु बिजलीघर से झील की जैव विविधता पर किसी प्रकार का संकट नहीं है। परमाणु बिजलीघर के पानी को क्लीन चिटवैज्ञानिकों ने इसे क्लीन चिट दे दी है। साथ ही यह भी माना है कि 30 सालों से स्थापित इस स्टेशन के बावजूद झील में पौधे, जंतु और मछलियों की किस्में दूसरे जलाशयों से बेहतर स्थिति में हैं। पानी की गुणवत्ता के आधार पर वैज्ञानिकों का कयास था कि यहां 42 किलो मछली प्रतिहेक्टेयर प्रतिवर्ष उत्पादन हो सकता है, जबकि वास्तविक उत्पादकता इससे करीब दोगुना निकली। वर्ष 2005-06 में जलाशय से मछली का उत्पादन 79.06 किलो प्रतिहेक्टेयर प्रतिवर्ष हुआ।

देश में किसी जलाशय की सर्वाधिक उत्पादकता 35 किलो प्रतिहेक्टेयर प्रतिवर्ष है। इस लिहाज से राणाप्रताप सागर की उत्पादकता इससे दोगुनी से अधिक है।

गौरतलब है कि राजस्थान परमाणु बिजलीघर के न्यूक्लियर रिएक्टर को ठंडा करने के लिए इस्तेमाल होने वाला जल गर्म पानी के रूप में जलाशय में प्रवाहित होता है। इससे जलाशय और यहां की जैव विविधता को नुकसान की बात उठने पर केंद्रीय परमाणु ऊर्जा विभाग ने महाराणा प्रताप कृषि व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) और भाभा एटोमिक पॉवर स्टेशन कोटा के पर्यावरण सर्वे प्रयोगशाला को संयुक्त परियोजना सौंपी।

नवंबर 2001 से सितंबर 2006 तक चली इस परियोजना का ध्येय राणा प्रताप सागर की जैव विविधता व उत्पादकता का अध्ययन करना था। परियोजना के मुख्य अन्वेषक सरोवर विज्ञानी डॉ.एल.एल.शर्मा, मुख्य संयोजक डॉ. पी.सी.वर्मा, सह अन्वेषक अरुण पुरोहित, प्रोजेक्ट कोर्डिनेटर डॉ.बी.वेंकटरामानी थे। रिपोर्ट हाल में पूरी हुई है जिसे परमाणु ऊर्जा विभाग को सबमिट किया गया है।

रिपोर्ट में उजागर प्रमुख तथ्य
* अध्ययन में 27 पैमानों पर जलीय गुणवत्ता की जांच हुई। इसके बाद इसे माइल्ड यूट्रोफिक श्रेणी में माना गया जो संतुलित वर्ग में है।
* मलिनता का स्तर 232 सेमी पाया गया जो फतहसागर झील से बेहतर स्थिति में है।
* फॉस्फोरस की मात्रा थोड़ी ज्यादा पाई गई जो इसमें पोषक तत्वों की अधिकता को उजागर करती है।
* रिपोर्ट के अनुसार झील में 82 किस्मों के जलीय पादप प्लावक, 63 किस्मों के जंतु प्लावक, पेंदे में पाए जाने वाले 36 किस्मों के तंतु व मछलियों की 40 प्रजातियां पाई गई।
* झील में पाई गई मछलियों की प्रजातियों में अधिकांश व्यावसायिक उपयोग में आने वाली हैं। राहू, कतला, मृगाल, कालबसु, सिलंद के अलावा दुर्लभ किस्म चिताला-चिताला भी यहां पाई गई है जो अच्छा संकेत है।





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