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भारतीय सिनेमा की विविधता

परदे के पीछे. किसी भी वर्ष के आकलन में साधारणीकरण एवं आंकड़ों से पूरा तथ्य उजागर नहीं होता। मसलन ‘ओम शांति ओम’, ‘वेलकम’, ‘पार्टनर’ और ‘हे बेबी’ जैसी फिल्मों के जरिए हास्य फामरूले की सफलता से दर्शक के मूड को आंकना सही नहीं होगा, क्योंकि इसी वर्ष ‘चक दे इंडिया’ ‘भेजा फ्राई’ ‘तारे जमीं पर’ और ‘जब वी मेट’ भी खूब सफल रही हैं।

अगर अक्षय कुमार ने सफलता की तिकड़ी (‘नमस्ते लंदन’, ‘हे बेबी’ और ‘वेलकम’) प्राप्त की है तो विनय पाठक जैसे नए सितारे ने भी ‘भेजा फ्राई’, ‘जॉनी गद्दार’ और ‘आजा नचले’ तथा घोर असफल ‘खोया खोया चांद’ में अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीता है। अगर शाहरुख खान ने ‘चक दे इंडिया’ और ‘ओम शांति ओम’ में अपना शिखर स्थान कायम रखा है तो आमिर की ‘तारे जमीं पर’ में दर्शील नामक बाल कलाकार ने अभिनय की नई ऊंचाई कायम की है।

रानी मुखर्जी का सिंहासन हिला है और कैटरीना कैफ उभरी हैं। कोंकणा सेन अपनी साधारण शक्ल-सूरत के बावजूद दर्शकों को पसंद आई हैं। एक तरफ हास्य फिल्मों की सफलता है तो दूसरी तरफ मणिरत्नम ने ‘गुरु’ में एक उद्योगपति को अपने भरपूर भ्रष्टाचार के साथ नायक की तरह आभामंडित किया और फिल्म सफल रही।

शायद देश में किसी भी शर्त पर आर्थिक विकास की आकांक्षा इतनी बलवती है कि नैतिक मूल्य कोई मुद्दा ही नहीं रहा है, जिन्हें लेकर कुछ उम्रदराज लोग छाती कूटते रहते हैं। माया द्वारा रचे गए सोने के हिरण के पीछे सब भाग रहे हैं और मूल्यों की सीता के हरण का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। ‘गुरु’ की सफलता तो यही संकेत दे रही है।

निखिल आडवाणी ने छह प्रेम कहानियों को गूंथकर ‘सलामे इश्क’ प्रस्तुत की, जिसमें मधुर संगीत के साथ तकनीकी गुणवत्ता भी थी, परंतु दर्शकों ने फिल्म अस्वीकृत कर दी। आडवाणी की तरह अनुराग ने ‘मेट्रो’ में चार प्रेम कहानियों को गूंथकर महानगर की जीवनशैली के विरोधाभास प्रस्तुत किए। यह प्रयोग सफल रहा, परंतु संजय गुप्ता की ‘दस कहानियां’ अस्वीकृत हो गई। जाहिर है कि बॉक्स आफिस के नतीजों से आप किसी परंपरा के विकास को पकड़ नहीं सकते।

प्रारंभ से ही हिंदुस्तानी सिनेमा में विविधता रही है और वह आज भी कायम है। दरअसल सफलता का सिनेमा में कोई फामरूला नहीं है। 16 लड़कियों के साथ ‘चक दे इंडिया’ सफल रही और जॉन अब्राहम की ‘गोल’ असफल हो गई। फिल्म उद्योग में केवल पांच सितारे- शाहरुख, सलमान, आमिर, अक्षय कुमार और रितिक रोशन ऐसे हैं, जिन्हें दी जाने वाली भारी रकम उनके बॉक्स आफिस मूल्य के अनुरूप है।

जॉन अब्राहम, अक्षय खन्ना, इमरान हाशमी, अजरुन रामपाल, शाइनी आहूजा इत्यादि करोड़ों मांगते हैं लेकिन पहले शो में 500 दर्शक भी नहीं जुटा पाते। इस तथ्य के बावजूद इन्हें काम मिल रहा है, क्योंकि फिल्म बनाना कुछ लोगों के अस्तित्व की लड़ाई है। सफल या असफल से बेफिक्र उन्हें फिल्म बनाते रहने में लाभ होता है। यह मनोरंजन उद्योग का अजीबोगरीब अर्थशास्त्र है। रणवीर कपूर और नील नितिन मुकेश की फिल्में असफल रहीं, परंतु उनकी प्रतिभा में कोई शक नहीं है। उन्हें काम मिल रहा है। गुजरते वर्ष में विविधता ही मनोरंजन उद्योग के ‘स्थायी’ की तरह उभरी है।





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