अभिमत. आप बता सकते हैं कि इस बीत रहे साल में लोगों ने सुख-दुख के अलावा कौन सी एक और चीज साझा की? हंसी, जी हां फिल्मों से लेकर सीरियलों तो मोबाइल एसएमएस से लेकर ई-मेल तक लोगों को गुदगुदाती रहीं।
यहां तक कि न्यूज चैनलों ने भी राजू श्रीवास्तव सरीखे हंसोड़ों को अपने प्राइम टाइम का एक हिस्सा बना लिया। यदि दिन में गुदगुदाते एसएमएस या ई-मेल हमें प्राप्त नहीं होते थे तो लगता था कि जैसे कुछ मिस हो रहा है। इस मनोवृत्ति को देखते हुए हम कह सकते हैं कि वर्ष 2007 हास्य के नाम भी रहा।
अब यहां स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि फिल्में, सीरियल तो ठीक, लेकिन न्यूज चैनलों को हंसी परोसने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका जवाब हंसी के मनोविज्ञान में निहित है। आप जरा सोचें कि हंसी कब आती है? किसी को भूख लगी हो, कोई किसी भी कारण से निराशा में जी रहा हो तो क्या उसे हंसी आ सकती है?
सीधा और सरल सा जवाब होगा, नहीं। इस वजह से ही वर्ष 2007 थोड़ा और महत्वपूर्ण हो जाता है। हम कह सकते हैं कि ढेर सारे माध्यमों से हमें हंसाने का प्रायोजन विशुद्ध कमर्शियल सोच से प्रेरित था। टीवी को जहां इससे टीआरपी मिल रही थी तो एसएमएस और ई-मेल से संबंधित कंपनी को पैसा।
लेकिन हमको हंसाने में इनका सफल रहना कमर्शियल पहलू से इतर हमारी एक उपलब्धि की ओर भी इशारा करता है। यह बताता है कि बीता वर्ष हमारे लिए संतुष्टि भरा भी रहा। अन्यथा एसएमएस, ई-मेल या अन्य तरीकों से ढेरों कोशिशों के बावजूद हमारे ओठों पर हंसी नहीं आ सकती थी।
हंसी का मनोविज्ञान कहता है कि जब तक आप संतुष्ट नहीं होंगे, आपको हंसी नहीं आ सकती। आप जबरन मुस्करा सकते हैं, लेकिन ठहाके नहीं लगा सकते। इस लिहाज से बीता वर्ष हमें कहीं न कहीं संतुष्ट करके भी जा रहा है।
जिंदगी की भागमभाग में संतुष्टि का इस रूप में थोड़ा सा भी अहसास कम खुशी की बात नहीं। संभव है कि यही अहसास हमें नव वर्ष 2008 में तृप्ति का अहसास देने का माध्यम भी बन जाए। जरा सोचिए!