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घर चलाने से आगे जीते कई जहां और

आलेख.women वर्ष 2007 ने भारतीय महिलाओं को गौरवान्वित होने के कई मौके दिए। इनमें सबसे प्रमुख है प्रतिभा पाटील का देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन होना। कांग्रेस की राजनीति में दशकों से कई बड़ी जिम्मेदारियां निभाने वाली प्रतिभाताई का राष्ट्रपति भवन में पहुंचना भारतीय महिलाओं के लिए निश्चित ही गर्व की बात है। याद रहे कि पिछले साल ही फोब्र्स पत्रिका ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को विश्व की तीसरी ताकतवर महिला के रूप में नामांकित किया था।

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने भी इसी साल उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनावों में स्पष्ट जीत हासिल करके जोरदार धमाका किया। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने के बाद उन्होंने दिल्ली, मुंबई और दूसरे बड़े शहरों में रैलियां करके साफ संकेत दे दिया कि उनकी नजर दिल्ली की सत्ता पर है।

मायावती की यह सफलता बताती है कि महिलाएं पुरुष प्रधान राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले कुछ अन्य राज्यों में भी सत्ता की मंजिल तक पहुंच सकती हैं। शीला दीक्षित, वसुंधराराजे, जयललिता, ममता बैनर्जी सरीखी महिला राजनेताओं ने भी पूरे साल राजनीतिक गलियारों में अपनी धाक बनाए रखी।

आर्थिक क्षेत्र में इस साल महिलाओं ने स्वर्णाक्षरों में कई उपलब्धियां दर्ज कीं। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रानी जाधव देश की सबसे बड़ी पोर्ट अथॉरिटी-मुंबई पोर्ट अथॉरिटी की पहली महिला चेयरपर्सन बनीं और यह साबित करने में सफल रहीं कि एक भारतीय महिला यह मुश्किल जिम्मेदारी निभाने में किसी से कम नहीं है। मुंबई पोर्ट अथॉरिटी में आने के पहले रानी महाराष्ट्र कृषि व खाद्य प्रसंस्करण निगम और महाराष्ट्र राज्य वस्त्र निगम के चेयरपर्सन पद की जिम्मेदारी निभा चुकी थीं।

देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई के मेयर पद पर शुभा राउल का चुना जाना भी भारतीय महिलाओं की उपलब्धि में शुमार किया जा सकता है। वह और उनके जैसी करीब एक लाख महिलाएं देश की विभिन्न स्थानीय स्वायत्तशासी संस्थाओं के संचालन की जिम्मेदारी निभा रही हैं। ऐसा देश के संविधान में स्थानीय स्वायत्तशासी संस्थाओं के 33 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाने से संभव हुआ है।

यूनीसेफ की रिपोर्टो के मुताबिक महिलाओं के इन जिम्मेदारी के पदों पर बैठने और उनके द्वारा नवोन्मेषी तरीके अपनाए जाने से खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं और बच्चों का जीवन-स्तर बेहतर करने में मदद मिली है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने संबंधी विधेयक संसद में विचाराधीन है और देर-सबेर उसे मंजूरी मिलना भी प्राय: तय है।

इस वर्ष कुछ भारतीय महिलाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इनमें पहला नाम पेप्सिको की सीईओ इंदिरा नूयी का है, जिन्हें कारोबार के क्षेत्र में दुनिया की सबसे ताकतवर महिलाओं में शुमार किया जाता है। भारतवंशी सुनीता विलियम्स ने अंतरिक्ष में सबसे ज्यादा समय रहने वाली महिला के रूप में अपना नाम रिकार्ड बुकों में दर्ज कराया है।

भारत में बायोटेक की किरण मजूमदार शॉ देश की सबसे धनी महिला बनी हैं, तो सुजाता फिरोदिया मोटवानी काइनेटिक मोटर कंपनी के सीईओ पद की जिम्मेदारी निभा रही हैं। देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी साल के आखिरी दिनों में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के कारण सुर्खियों में रहीं। मनोरंजन उद्योग में फराह खान ने ‘ओम शांति ओम’ सरीखी हिट फिल्म बनाकर दिखा दिया कि भारतीय महिला निदेशक हॉलीवुड की टक्कर की फिल्में बनाने का माद्दा रखती है।

कहावत है कि धन न हो तो महिलाओं के सारे अधिकार बेमतलब हैं। मेरिल लिंच के एक सर्वे के मुताबिक देश में 10 लाख डॉलर से ज्यादा की संपत्ति वाले व्यक्तियों की संख्या 19.3 प्रतिशत बढ़कर 83,000 हो गई है। इनमें लगभग 17 प्रतिशत महिलाएं हैं। कारपोरेट कंपनियों में उच्च पदों पर महिलाओं का अनुपात पहले की तुलना में तेजी से बढ़ा है। जमीन-जायदाद, सोना-चांदी और समसामयिक कला के क्षेत्र में भी महिलाएं अच्छा-खासा निवेश कर रही हैं।

ये तमाम उपलब्धियां किसी भी दृष्टि से उल्लेखनीय हैं और दुनिया में भारतीय महिलाओं की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाली हैं। 2007 में भारतीय महिलाओं ने प्रगति और उपलब्धियों के जो सोपान चढ़े हैं, 2008 में उनमें इजाफा ही होगा और तब आधी दुनिया के नाम से पहचानी जाने वाली भारत की नारी शक्ति पूरी दुनिया में अपना डंका बजवाएगी और लोहा मनवाएगी।

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार और फेमिना की संपादक रही हैं।





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