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बहुत कुछ बदल के गया यह साल

दृष्टिकोण. 2007 वर्ष 2007 बहुत जल्द इतिहास का हिस्सा बनने वाला है। कुछ नए के आगमन और कुछ प्रियजनों के विछोह के बीच हम एक नए कालखंड की ओर बढ़ रहे हैं। हमारे मोबाइल फोन, कंप्यूटरों और डिजिटल घड़ियों की तारीख जल्द ही एक पायदान ऊपर खिसकने वाली है।

और यह सब उस समय हो रहा है, जब हम पहले से अधिक समृद्ध हुए हैं। चाहे हम किसी भी क्षेत्र में क्यों न हों। हमने लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सफलता हासिल की है और बहुत जल्द हम चांद पर भी जाने वाले हैं। एक लिहाज से भारत में रहने के लिए यह समय सबसे अधिक उपयुक्त है।

लेकिन यह ऐसा भी वर्ष था जो एक वैश्विक महाशक्ति और उसकी मुद्रा के कमजोर होने का साक्षी बना और एक ऐसी टीम ने ट्वेंटी-20 क्रिकेट विश्वकप जीता, जिसकी सफलता की उम्मीद हमें दूर-दूर तक नहीं थी।

सच तो यह भी है कि दुनिया अपने एकमात्र हिंदू राष्ट्र को खोने जा रही है। ऐसे में अपने पड़ोसी देशों में चल रही उथल-पुथल के बीच एकमात्र निर्वाचित लोकतंत्र होना भी भारत के लिए एक दुर्लभ बात मानी जाएगी।

दिसंबर माह के आज का आखिरी दिन आप तमाम प्रासंगिक लगने वाली बातें सोच रहे होंगे, लेकिन जब वह पहले पहल दिमाग में आई थीं तो शायद अप्रासंगिक ही रही होंगी। कुछ वर्ष पहले तक बीते साल को देखना एक साधारण और पुरानी यादों को ताजा करने जैसा होता था। उस वक्त दुनिया आज की तरह नेटवर्क से जुड़ी हुई नहीं थी।

समाचारों और सूचनाओं का आदान-प्रदान भी तेज नहीं था। दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली उपलब्धियां या दुर्घटनाएं ही याद करने लायक होती थीं। नतीजतन वर्ष भीतर हुई कोई बड़ी विमान दुर्घटना, विशालकाय बांध का निर्माण या किसी विदेशी राजनयिक की यात्रा ही वर्ष के अंत में याद और चर्चा करने लायक होती थीं।

अब ऐसा नहीं है। हम हर रोज ढेर सारी घटनाओं से रूबरू होते हैं। हर घंटे इतना कुछ घटता है कि वर्ष के अंत में क्या याद रखना है, क्या नहीं यह वर्गीकरण करना खासा मुश्किल है। पिछले कुछ वर्षो से तो पूरी दुनिया ही एकध्रुवीय हो गई है, लेकिन अमेरिका और उसके राष्ट्रपति की लोकप्रियता तो कम हुई ही है, डॉलर का रुतबा भी घटा है।

हमें निर्यात और आईटी उद्योग में जबरदस्त नुकसान तो उठाना ही पड़ा, अब तो सेलिब्रिटीज और धनकुबेरों ने भी यूरो को वैश्विक मुद्रा के रूप में स्वीकारना शुरू कर दिया है। ऐसे में कुछ समय पहले तक जिस चीज की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, वह अब साकार हो रही है।

आज हम सभी वर्ष 2007 की घटनाओं को याद कर रहे हैं। खेल के मैदान, अंतरिक्ष, राजनीति और स्टॉक मार्केट में उपलब्धियों से भरे क्षण सामने आ रहे हैं। साथ ही हम घर-परिवार या समाज में घटी उन घटनाओं को भी याद करने को मजबूर हैं, जहां अमानवीय हाथों ने मानवता का गला घोंटा। सिर्फ पैसा कमाना इस तेजी से जीवन का महत्वपूर्ण लक्ष्य बना कि रिश्ते-नाते और संवेदनशीलता अलग-थलग पड़ गई।

आलम यह आ पहुंचा कि असुविधा होने पर हम अपने मोबाइल और कंप्यूटर में ही सहारा ढूंढ़ने लगे। रुपए की गर्माहट ने किसी को नहीं बख्शा। यहां तक कि पढ़ने-लिखने, परस्पर हंसी-मजाक करने और किस्सागोई से जीवन की मिलने वाली गर्माहट भी खोने लगी। अब इसका स्थान चुटकुले परोसते एसएमएस और ई-मेल, ब्लॉग और कम्युनिटी वेबसाइट ने ले लिया है। मानना पड़ेगा कि हम हाईटेक हो गए हैं।

आज भले ही हम विद्यार्थी हों, प्रोफेशनल हों या फिर साधारण होममेकर, कठिन परिश्रम और स्पष्ट लक्ष्य को ही साथ लेकर आगे बढ़ा जा सकता है। सफलता प्राप्त करने में हमें रत्ती भर भी शक नहीं है, क्योंकि अनुभव ने हमें सही चालें सिखा दी हैं।

हमारे युवा हमसे कहीं अधिक आत्मविश्वास से भरे हैं। वे जो चाहते हैं उसे हासिल करके रहेंगे, क्योंकि वर्ष 2007 के भारत ने अब सब संभव कर दिखाया है। आज आर्थिक उदारीकरण और प्रतिस्पर्धा से न सिर्फ पैसे का मूल्य, बल्कि चयन के विकल्प भी बढ़ गए हैं, जो पहले उपलब्ध नहीं थे।

कुछ ऐसे पहलू भी हैं, जो बद से बदतर या उन्हें जितना अच्छा होना चाहिए था उतने नहीं हो पाए। जैसे महिला और बाल कल्याण, कृषि, शिक्षा, पर्यावरण, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं, वित्तीय अनुशासन, मानवाधिकार, गरीबी निवारण और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता। इन क्षेत्रों में संघर्ष और निराशा गंभीर चिंता का विषय है।

फिर आते हैं दो भारत, एक संपन्न और दूसरा वंचितों के लिए। बहस का एक बड़ा मुद्दा तो यही है कि क्या इनमें से एक भारत दूसरे पर हावी हो रहा है। आर्थिक विकास दर और उसके लाभ के आलोक में जहां यह देखना आसान है कि धीरे-धीरे वंचित भारत एक दिन खत्म हो जाएगा। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि विद्यमान असमानताएं निश्चित तौर पर किसी न किसी तरह के संघर्ष को जन्म देंगी।

समझने की जरूरत यह है कि यह दोनों भारत ही सच्चई हैं। इसे देखते हुए हमें ऐसे विकल्प चुनने पड़ेंगे, जिसकी मदद से भारत की मिश्रित कहानी लिखी जा सके। इसके लिए हमें छोटे किंतु सही विकल्प चुनने पड़ेंगे और एक बार जब हम इसकी शुरुआत कर देंगे तो हम अधिक विश्वास से परिपूर्ण और सफल महसूस करेंगे।

सही शख्स को सहयोग देना, बगैर भय के सच का साथ देना, सकारात्मक व्यवहार करने के लिए सूचनाओं के आदान-प्रदान का नेटवर्क तैयार करना जैसे छोटे प्रयास करने होंगे। हमारे इन छोटे प्रयासों से हमारी इच्छाएं कहीं मजबूती के साथ परिलक्षित होंगी। यह काम किसी बड़े कदम को उठाने से कहीं महत्वपूर्ण साबित होगा।

देश भर के प्रत्येक क्षेत्र से जुड़ीं उद्यमशीलता और प्रयोगधर्मिता की कहानियां नित नए सामाजिक और आर्थिक पुरस्कार देकर जाएंगी। हमारी सफलता की कहानी एक दिन या रात भर में पूरी नहीं हो जाएगी। इसे पूरा करने के लिए हमें बुरे समय या तेजी से बीतते समय के लिए रुक उस पर विलाप बंद करने की महती जरूरत पड़ेगी।

समय तो तेजी से बीतता ही रहेगा। यह तो हम पर निर्भर करेगा कि हम आने वाले 365 दिनों में कौन से रंग भरते हैं, जो उसकी सीरत बदल दें। ध्यान रखें हम सभी सीमित ओवर वाला मैच खेल रहे हैं। चौके-छक्कों की मदद से हमें अधिक से अधिक रन बटोरने हैं, क्योंकि जीवन की परिणति तो तय है। अंतत: हमारा प्रदर्शन ही याद रह जाएगा।





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