आपस की बात
बच्चे जमीन पर ईश्वर की मुट्ठी से छिटके तारे हैं यह फिल्म एक आईना है जो माता-पिता, स्कूल को यह दिखाता है कि वे प्राय: बच्चों को समझने में कितनी भयानक भूल करते हैं। इसी वजह से वे स्वयं और बच्चे तनाव झेलते हैं। चूंकि वे समस्या को ही समझ नहीं पाते इसलिए असहनीय स्थिति बनती है।
आमिर खान की घोर प्रशंसा की जाना चाहिए कि बच्चों की इस भोली, मासूम उम्र की गंभीर समस्या को उन्होंने समझा और उसे दर्शाने का जोखिम उठाया।
हो सकता है कि कई पेरेंट्स इससे कुछ सीखें और डायलेक्ससीया से पीड़ित अपने बच्चों के प्रति उनका व्यवहार अति सहानुभूतिपूर्ण और सकरात्मक हो जाए। आमिर खान की बाल मन के प्रति इतनी संवदेनशीलता भीतर तक झकझोरती रही, पर एक प्रश्न भी उठा।
बच्चों का बचपन तो एक अमानत है। इस फिल्म को बनाते समय, उस बच्चे का चित्रण करते समय, उसकी समस्याओं से जूझते और संघर्ष करते हुए, दिखाते समय और पल-पल उस बच्चे से बतियाते हुए, उससे निकटता और आत्मीयता स्थापित करते हुए क्या आमिर खान को अपने बेटे की एक पल भी याद नहीं आई? क्या उन्हें भावनात्मक रूप से एक बार भी चुभन नहीं हुई कि उनका बेटा, पिता के दुलार और स्नेह पाए बिना किस इमोशनल संघर्ष से गुजर रहा होगा।
तलाक की कीमत पत्नी नहीं चुकाती, पति भी नहीं चुकाता, उसका सबसे ज्यादा भुगतान बच्चे करते हैं। इस फिल्म को बनाने से पहले, बनाते समय अपने परिवार के तारों की मद्धिम सी रोशनी की ओर भी काश, आमिर खान देख पाते। बाल मन को समझने की गहरी समझ और उसकी पीड़ा को समझने वाले आमिर खान की इस अपने तारों के प्रति अनदेखी एक विसंगति ही लगती है।
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