अभिमत. किसी भी देश के विकास की बुनियाद कृषि और उद्योग होते हैं। इसे समझते हुए ही सरकार ने औद्योगीकरण को बढ़ावा देने वाली नीतियां बनाई, जिन्हें समय के साथ-साथ और उदार भी बनाया। इन नीतियों में एक प्रावधान स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) का भी रखा गया।
लेकिन सेज को अनुमति देने में राज्य सरकारें इतने उतावलेपन से काम ले रही हैं कि जब-तब विवाद सिर उठाने लगे हैं। नंदीग्राम के बाद हालिया उदाहरण गोवा का है। यह तो सही रहा कि गोवा के मुख्यमंत्री दिगम्बर कामथ ने सेज विरोधी लॉबी के बढ़ते दबाव से प्रस्तावित सेज रद्द कर दिए।
कामथ की यह पहल सराहनीय है। सेज की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण शर्त यह है कि किसानों की कृषि योग्य भूमि को इसके लिए अधिग्रहीत न किया जाए। अधिग्रहीत की जा रही भूमि के स्वामियों को वैकल्पिक भूमि या रोजगार का अवसर मुहैया कराया जाए। साथ ही स्थानीय स्तर पर सभी राजनीतिक दलों में सहमति के बाद ही सेज को अनुमति दी जाए।
जहां-जहां सेज को लेकर विवाद उठे, वहां या तो कृषि योग्य भमि का अधिग्रहण किया गया, भू-स्वामियों को उचित मुआवजा नहीं मिल पाया। गोवा भी इनमें से एक था, इसीलिए सेज विरोधी लॉबी लंबे समय से आपत्ति दर्ज करा रही थी। उनका यह कहना तर्कसंगत ही था कि सेज की स्थापना से गोवा का मूल स्वरूप और पहचान खत्म हो जाएगी। इसकी पुष्टि गोवा सरकार द्वारा गठित टास्क फोर्स ने भी की।
ऐसे में गोवा राज्य सरकार का निर्णय न सिर्फ गोवा, बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी आंखें खोलने वाला हो सकता है। विकास होना चाहिए, इससे किसी को इंकार नहीं है। बस, विकास क्षेत्र के माहौल और स्थानीय लोगों की सोच के अनुरूप होना चाहिए। सही है सेज से विकास को गति मिलेगी, लेकिन ऐसा विकास किस काम का, जो पहचान पर ही सवालिया निशान लगा दे।
सेज स्थापित हों, लेकिन स्थानीय माहौल और लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप। जबरिया विकास किसी को भी नहीं सुहाता। साथ ही कानून-व्यवस्था के लिए संकट अलग खड़ा करता है। सेज समर्थक राज्य सरकारें इस क्रम में आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार से सबक सीख सकती हैं, जहां क्रमश: 48 और 24 सेज हैं, लेकिन विवाद दूर-दूर तक नहीं है।