आलेख.
भारतीय दूरसंचार क्षेत्र विश्व में सबसे तेजी से बढ़ने वाला टेलीकॉम सेक्टर है। यह लगातार बहुत तेज वृद्धि दर दर्ज कराने में सफल रहा है। यह दर समग्र आर्थिक विकास की दर से भी कहीं अधिक है। दूरसंचार क्षेत्र की औसत वृद्धि दर 20 से 22 फीसदी रही है, लेकिन किन्हीं-किन्हीं वर्ष इस दर ने 40-45 फीसदी की वृद्धि दर का आंकड़ा भी छुआ है। आज भारतीय दूरसंचार सेवा के तहत 40 मिलियन फिक्सड लाइन और 215 मिलियन मोबाइल उपभोक्ता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यानी 22 फीसदी आबादी टेलीफोन से जुड़ी हुई है।
दूरसंचार क्षेत्र की वृद्धि दर के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार कारक राजनीतिक इच्छाशक्ति होती है। दुनिया के विभिन्न देशों में मसलन कोरिया, जापान, चीन, सिंगापुर और अन्य में सरकारी प्रयासों से ही टेलीकॉम क्षेत्र ने रफ्तार पकड़ी है। सरकार से विभिन्न उद्योगों के हाथ मिलाने से वृद्धि दर और गति पकड़ती है। बुनियादी ढांचों की भी बुनियाद माना जाने वाला दूरसंचार क्षेत्र ही किसी भी देश के आर्थिक विकास के लिए ईंधन का काम करता है।
औद्योगिक इकाइयां इसे अंगीकार कर इसके फैले तंत्र का लाभ उठाती हैं। दूरसंचार क्षेत्र न सिर्फ उनकी प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करता है, बल्कि कई मामलों में उनके अस्तित्व के लिए भी संजीवनी साबित होता है। अक्सर तकनीक नीति निर्धारक साबित होती है और उससे ही बाजार की दिशा तय होती है। आगे बढ़ने को इच्छुक सरकारें इस सच्चई को समझ एक ऐसा माहौल रचती हैं, जहां तकनीक का इस्तेमाल हो सके और बाजार फल-फूल सके।
भारत में भी राष्ट्रीय दूरसंचार नीतियों ने आम उपभोक्ताओं समेत उद्योगों का विश्वास बढ़ाने में सफलता हासिल की है। वे जान चुके हैं कि सरकार दूरसंचार क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कृतसंकल्प है। ऐसे में नीति नियंता और प्रबंधकर्ता वृद्धि दर को बढ़ावा देने के लिए प्रतिस्पर्धा पर निर्भर करते हैं। तकनीकी प्रधान युवा मोबाइल और इंटरनेट क्रांति के संवाहक बने हैं। यह चलन आगे भी जारी रहेगा और जल्द ही ग्रामीण क्षेत्रों को भी अपनी गिरफ्त में ले लेगा।
दूरसंचार एक वैश्विक अवधारणा है, जो एक तेज गति से बढ़ता क्षेत्र भी है। यह दुनिया के किसी भी भाग में विकास से तुरंत प्रभावित होता है। उदारीकरण और विकासपरक प्रतिस्पर्धा ने बाजार में तमाम ढांचागत बदलाव लाने का काम किया है।
अधिग्रहण और विलय के दौर ने भी निवेश, नई तकनीक और नई व्यापारिक रणनीतियों को प्रोत्साहित किया है। ऐसे में गुणवत्ता प्रधान सेवा की मांग भी तेजी से बदली है। पीएसटीएन उपभोक्ताओं की संख्या में कमी, मोबाइल उपभोक्ताओं में तेज वृद्धि, वीओआईपी के बढ़ते प्रयोग और सेवा के प्रति झुकाव ने बहुत तेजी से व्यापार की प्रकृति और नीतियों को बदलने का काम किया है।
व्यापार जगत में भारतीय दूरसंचार क्षेत्र को तेजी से बढ़ते और लाभदायी बाजार का दर्जा प्राप्त है। इसके बावजूद भारत को रणनीतिक साझेदार के तौर पर नहीं देखा जाता है। यद्यपि सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भारत की पहचान एक अगुआ राष्ट्र की है, इसके बावजूद गुणवत्ता प्रधान टेलीकॉम हार्डवेयर के उत्पादक के तौर पर उसे नहीं देखा जाता है।
भारत इस क्षेत्र में चीन, जापान और कोरिया (सीजेके) की तरह महत्वपूर्ण साझेदार नहीं है। ये तीनों ही देश अपने उत्पादों और सेवाओं के जरिये बाजार को प्रभावित करते रहते हैं। ऐसे में भारत को एसएटीआरसी, एपीटी और आईटीयू जैसे क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में बढ़-चढ़ कर उपस्थिति दर्ज कराने की और सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत है।
प्रश्न उठता है कि इसके लिए भारतीय दूरसंचार क्षेत्र को क्या कदम उठाने होंगे? जवाब है सरकारी नेतृत्व, उत्साही उद्योगों और उपभोक्ताओं की जरूरत का सही तालमेल बैठाने की। ब्रॉडबैंड के विकास को प्रोत्साहन देने के लिए यह बहुत ही जरूरी है। इसके अलावा रिसर्च एंड डेवलपमेंट के क्षेत्र में भी सरकार और इंडस्ट्री को परस्पर समन्वय स्थापित करना होगा। इसके जरिए ही ब्रांड इंडिया आकार ले सकेगा। शुरुआती चरण में कुछ उन्नत उत्पादों को विकसित कर उन्हें बढ़ावा देना होगा।
इसके साथ-साथ दो खामोश क्रांतियों की भी अलख जगानी होगी। पहली क्रांति के लिए सरकारी और गैर-सरकारी इकाइयों और उद्योगों में काम कर रहे प्रतिभाशाली युवा प्रशिक्षणार्थियों को जोड़ना होगा, जो दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हो रहे तकनीकी विकास पर नजर रखते हों। साथ ही वे सरकार और उद्योग को ठोस इनपुट देने की हैसियत में भी हों।
दूसरे के लिए एक थिंक टैंक का गठन करना होगा, जो वर्तमान और भविष्य की रुचियों से जुड़े मुद्दों पर बगैर किसी पक्षपात के इनपुट उपलब्ध करा सकें। यही नहीं सरकार को इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि प्रोफेशनल्स को अपेक्षित सम्मान और पहचान मिले। जापान और कोरिया जैसे देश के तेजी से आगे बढ़ने का कारण ही यही है कि उन्होंने अपने प्रोफेशनल्स को न सिर्फ यथोचित सम्मान दिया, बल्कि उन्हें उचित पहचान भी दी। यही सब कुछ भारत में भी किए जाने की आवश्यकता है।
लेखक एशिया-पैसिफिक टेलीकम्यूनिटी के महासचिव हैं। यह संस्था एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दूरसंचार तकनीक को बढ़ावा देने का काम करती है।