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जरूरत है फल-सब्जियों में दूसरी हरित क्रांति की

दृष्टिकोण. farmer विकास की कोई भी परिभाषा कृषि उत्पाद को नजरअंदाज नहीं कर सकती। आज भारत विकास की जिन ऊंचाइयों को छू रहा है वह पिछले कई दशकों से जारी कृषि क्रांति की वजह से ही संभव हो सका है। इस प्रगति के लिए देश भर में हरित क्रांति के तहत कृषि तकनीक को उन्नत बनाया गया, बीजों के नए प्रकार इस्तेमाल में लाए गए और सरकार तथा किसानों के बीच तालमेल बढ़ा व बेहतर हुआ। आने वाले समय में जरूरत है ग्रीन रिवोल्यूशन को एवरग्रीन रिवोल्यूशन बनाने की।

हालांकि इस एवरग्रीन रिवोल्यूशन को हासिल करने के मार्ग में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि हम किसी तरह पर्यावरण को नुकसान पहुचाए बगैर कृषि उत्पादकता बढ़ाएं। इसके अलावा एवरग्रीन रिवोल्यूशन का लक्ष्य तब तक असंभव ही रहेगा, जब तक विभिन्न सरकारी विभाग कृषि विकास के लिए एक साथ एकरूपता और पूर्ण सामंजस्य के साथ काम नहीं करते।

वर्ष 2008 में कृषि परिदृश्य खासा उत्साहवर्धक और सुधारवादी लग रहा है। सरकार द्वारा लागू विभिन्न नीतियों और कृषि आधारित कार्यक्रमों से इस वर्ष स्थिति में सुधार आना चाहिए। एक नजर डालें तो सरकार का भारत निर्माण उद्घोष बहुत उम्मीदें जगाता है। तमाम अन्य बातों समेत इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों और 10 मिलियन हैक्टेयर अतिरिक्त भूमि की सिंचाई पर खासा जोर दिया गया है।

इसके अलावा ग्रामीण रोजगार योजना, नेशनल हार्टीकल्चर मिशन, किसानों को संस्थागत ऋण का विस्तार, नेशनल रेनफेड एरिया अथॉरिटी का गठन, राष्ट्रीय मत्स्य पालन विकास बोर्ड का गठन, माइक्रो इरीगेशन प्रोग्राम, कृषि विपणन में सुधार और बाजार के मूलभूत ढांचे का विकास, स्मॉल फार्मर एग्रीबिजनेस कंसोर्टियम (एसएफएसी) के जरिए निवेश, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, एकीकृत खाद्य कानून, राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड, राष्ट्रीय बांस मिशन, ज्ञान चौपाल के जरिए कृषि जागरूकता बढ़ाना समेत पौध प्रजातियां और किसान अधिकार अधिनियम (2001) व बायोडायवर्सिटी अधिनियम (2002) से यह वर्ष बहुत उम्मीदें जगाता है।

इन सरकारी कार्यक्रमों व योजनाओं के बल पर ही कथित दूसरी हरित क्रांति फल और सब्जियों के क्षेत्र में लाई जा सकती है। हालांकि भारत की उपज बढ़ाने वाले पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश सरीखे उपजाऊ क्षेत्र तमाम तरह की पर्यावरण और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं।

इनके लिए हमारा प्रयास उपयुक्त तकनीक और जन नीतियों से हासिल लाभ को संरक्षित करने वाला होना चाहिए। ये वे क्षेत्र हैं जिन्होंने पहली हरित क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारतीय कृषि के भविष्य के क्रम में भी इन्हीं क्षेत्रों से उम्मीदें हैं। इसके लिए इन्हें तकनीकी मदद व प्रोत्साहन देने की जरूरत है।

इसके अलावा देश भर के किसानों का कृषि से हो रहा मोहभंग भी एक बड़ी समस्या या चुनौती है। इसके लिए किसानों में उपजा असंतोष प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। यह असंतोष फसल की लागत तक न निकल पाने से पैदा हुआ है। जोत की लागत निकल सके, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

हमें ध्यान रखना होगा कि यदि फार्म इकोलॉजी और इकोनॉमिक्स में एक संतुलन कायम नहीं हो सका तो कृषि के क्षेत्र में कुछ भी बेहतर नहीं हो सकेगा। इस असंतुलन की वजह से ही राष्ट्रीय कृषि नीति 2000 के तहत निर्धारित किया गया 4 फीसदी विकास लक्ष्य हम हासिल नहीं कर सके हैं। हमें सार्थक प्रयासों से जरूरी संतुलन लाना ही होगा।

एग्रो इंडस्ट्री और कांट्रेक्ट फार्मिग भी किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प बन सकता है, बशर्ते इसे उत्पादक और खरीदार दोनों के हितों की पूर्ति करने वाला बनाकर विकसित किया जाए। उत्पादकता, लाभ और निरंतरता बनाए रखने के लिए छोटे किसानों को भी तकनीकी रूप से थोड़ा उन्नत बनाए जाने की आवश्यकता है।

इसके लिए आधुनिक विज्ञान और कृषि समझ वाली परंपरागत तकनीक के मिश्रण से विकसित इको तकनीक को प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। यह देखते हुए भी कि खाद्यान्नों के कुल उत्पादन और मांग में भारी अंतर विद्यमान है, कृषि में अपेक्षित सुधार और विकास की महती जरूरत है।

गौर करने की बात है कि भारत में खाद्यान्न आपूर्ति के सापेक्ष मांग बहुत ज्यादा है। अगर हम चीन या अन्य देशों से तुलना करें तो अधिकांश फसलों में हमारी उत्पादकता बहुत कम है। इसीलिए बफर स्टॉक बनाए रखने के लिए हमें निर्यात पर निर्भर रहना पड़ता है। राष्ट्रीय संप्रभुत्ता बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि हम अनाज का पर्याप्त बफर स्टॉक बनाए रखें।

आधुनिक तकनीक के क्रम में इन दिनों भारत में जेनेटिक मोडीफाइड बीजों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। सही है कि जैव-अजैव दबावों का सामना करने के लिए विभिन्न प्रजातियों को विकसित करने के लिए जेनेटिक संशोधित बीज एक बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। लेकिन इनके इस्तेमाल पर कुछ विरोध भी है।

इनकी गुणवत्ता परखने के लिए हमारे पास एक ही स्वायत्तशासी नेशनल बायोटेक्नोलॉजी रेगुलेटरी अथॉरिटी है। ऐसे में इन बीजों के इस्तेमाल का सार यही होना चाहिए कि वे पर्यावरण के लिए बिल्कुल भी नुकसानदेह न हों। किसान और उसके परिवार के स्वास्थ्य समेत जैव पारिस्थितिकी के लिए हानिकारकन हो। इनकी गुणवत्ता ऐसी हो जो कृषि तंत्र की आर्थिक निरतंरता के लिए लाभदायी सिद्ध हो। इसके साथ ही ये उपभोक्ता हितों को संरक्षण भी देने वाले हों।

राष्ट्र की जैविक सुरक्षा समेत घरेलू और विदेशी बाजार के लिए उपयुक्त बीज इस्तेमाल में लाने से ही यह उद्देश्य हासिल हो सकेगा। भारतीय कृषि के विकास और उसके आधुनिकीकरण के लिए बहुत जरूरी है कि कृषि मंत्री द्वारा संसद में पेश राष्ट्रीय कृषि नीति को वास्तविकता के धरातल पर लागू किया जाए।

इसे कागजों पर ही न रहने दिया जाए। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर समग्र रूप से प्रयास करने होंगे और कृषि नीति को उसकी मूलभावना के साथ अमली जामा पहनाना होगा। तभी भारत कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर व उन्नत राष्ट्र का दर्जा हासिल कर सकेगा।

1960 की हरित क्रांति में लेखक ने महती भूमिका निभाई थी। वर्तमान में वे राज्यसभा सदस्य और एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं।





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