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जमीन से निकलती है मजबूत विकास की रचना

सम्पादकीय. आजादी के बाद से हम पढ़ते व सुनते चले आ रहे हैं कि भारत एक कृषिप्रधान देश है। आबादी का बड़ा हिस्सा गांव में रहता है और खेती करता है। इसी धारणा पर देश में विकास होता चला गया और अब हम एक अभूतपूर्व विकास दर के साथ विकसित देशों के साथ खड़े होने की होड़ में हैं। यह ठीक है कि आज की विकास दर के लिए कई नीतिपरक कारण जिम्मेदार थे, पर ऐसा नहीं कहा जा सकता कि कृषि विकास इसके लिए जिम्मेदार नहीं था।

आज की हमारी आर्थिक मजबूती के लिए पिछले कई दशकों की कृषि उत्पादकता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन सच्चई यह है कि आज कृषि हमारे आर्थिक विकास के ऊंचे मानकों से कहीं नीचे है। बड़े उद्योग, सेवा क्षेत्र और निर्माण आदि सेक्टर कहीं आगे निकल गए और खेती पीछे रह गई- कम उत्पादन, कम निवेश और नीची प्राथमिकता के साथ।

कृषि अभी भी प्राकृतिक संसाधनों और प्रकृति की कृपा पर बहुत हद तक निर्भर है और बड़े उद्योगों का ध्यान अभी व्यापक स्तर पर कृषि पर नहीं गया है। दूसरी ओर भूजल, कृषि भूमि और अन्य संसाधनों का दोहन एक सीमा से अधिक होने की वजह से संसाधनों की कमी एक विकट समस्या के रूप में सामने खड़ी हो रही है।

जैसे हम दुनिया में अनेक क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों के बल पर आगे बढ़ रहे हैं, वैसे हमें अपनी सबसे मजबूत और मूलभूत उपलब्धि यानी कृषि को समुचित ध्यान देना नहीं भूलना है। आज के खुले बाजार और व्यापार को और प्रोत्साहन देने वाले माहौल में जरूरत है कृषि को और आकर्षक बनाने की। सिर्फ हर बजट में कृषि की प्रधानता और महत्व को दोहराने से ज्यादा कुछ हासिल नहीं होता।

कृषि के लिए जल्दी ही एक ऐसे पैकेज की जरूरत है जिसमें किसानों को राहत पहुंचाने वाली नीतियों के साथ-साथ नई तकनीक का समावेश हो। पैकेज भी ऐसा कि कमजोर गरीब किसान भी उसका फायदा उठा सके। आज जैसे टेलीकॉम क्षेत्र से जुड़ा हर व्यक्ति, छोटा कारीगर या बड़ा उद्यमी, लाभान्वित हो रहा है, वैसी ही जरूरत खेती के साथ भी है।

चमकती आर्थिक समृद्धि के बीच किसानों की खुशहाली और उनके चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए राजनीतिक बयानों से ज्यादा समाज के सभी वर्र्गो द्वारा कृषि की ओर समुचित ध्यान देना जरूरी है। हमें और सभी शहरवासियों को भी यह जानना जरूरी है कि मजबूत विकास की इमारत जमीन पर खड़ी तो होती है पर उसकी जड़ें जमीन के अंदर ही होती हैं।

वैज्ञानिक, व्यापारी, निर्माता, उद्योगपति, अन्य नौकरीपेशा लोगों को भी किसान को समाज के एक सम्मानजनक हिस्से के तौर पर लेना जरूरी है, न कि एक गरीब, बेबस और मजबूर आदमी की तरह, जो आदतन हमसे कहीं दूर कोने में रहेगा, वैसे ही जैसे इतने सालों तक वह हाशिए पर खड़ा रहा।





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