दृष्टिकोण.
भारत के विकास की कहानी अब किसी को हैरत में नहीं डालती। दुनिया ने आज मान लिया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की चकाचौंध कर देने वाली प्रगति का आधार उसकी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली, मिश्रित अर्थव्यवस्था और उदारीकरण की सोची-समझी नीतियां हैं।
विनिर्माण, आईटी और सेवा क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षो से जारी तेज प्रगति इस बात का संकेत है कि आने वाले कुछ वर्षो में भारत विश्व की तीन-चार बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाने लगेगा। इसके बावजूद लगातार तेज विकास दर बनाए रहने के लिए भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ तालमेल बैठाना होगा।
अर्थव्यवस्था के भावी परिदृश्य में मानव संसाधन की भूमिका भी यकीनन बहुत महत्वपूर्ण होगी। प्रमुख क्षेत्रों, खासकर विनिर्माण और आईटी के क्षेत्रों में ऊंची विकास दर बनाए रखने तथा उसे और तेज करने में जिस तरह के मानव संसाधन की जरूरत पड़ने वाली है उसे तैयार करने के लिए हमें अभी से कमर कसनी होगी।
भारतीय प्रतिभाएं दुनियाभर में प्रतिष्ठित कंपनियों के प्रबंधन के शिखर पर पहुंच अपना सिक्का पहले ही जमा चुकी हैं। आने वाले वर्षो में भी उनकी मांग बनी रहनी है। ऐसे में देश को कुशल पेशेवरों की समस्या का सामना करना पड़ सकता है, जिस पर तुरंत ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है।
मौजूदा भारतीय आबादी की विशेषताएं इस प्रकार हैं: ज्यादातर लोग ग्रामीण पृष्ठभूमि के और कम हुनरमंद हैं। अपेक्षाकृत एक छोटा वर्ग उद्योगों की जरूरत के मुताबिक मध्यम दर्जे का कौशल रखता है। शीर्ष स्तर पर बहुत थोड़े से लोग क्षेत्र विशेष में अति-कुशल हैं। खेतिहर मजदूरों की संख्या बहुत बड़ी और कौशल बहुत कम है।
इसके विपरीत कल के भारत को कम कौशल और ज्यादा मेहनत वाले काम करने के लिए कम लोगों की जरूरत होगी और उद्योगों की जरूरतों के मुताबिक मध्यम दर्जे के कौशल वाले ज्यादा लोगों की जरूरत पड़ेगी तथा पिरामिड की तरह शीर्ष पर समुचित संख्या में अति-कुशल लोगों की जरूरत होगी।
प्रौद्योगिकी और शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बदलावों के मद्देनजर भविष्य के लिए की गई उक्त कल्पना दुनिया के बाकी हिस्सों पर भी उतनी ही लागू होती है, जितनी कि भारत पर। उक्त डायनिज्म सफलतापूर्वक हासिल करने के लिए उपलब्ध मानव संसाधन को हुनर की बढ़ती मांग के अनुरूप तेजी से और कुशलता से तैयार किया जाना जरूरी है। तैयारशुदा हुनरमंद मानव संसाधन की मार्केटिंग में समय और गुणवत्ता की खासी अहमियत होती है।
चौदह साल से कम आयु के करीब 32 करोड़ किशोरों के आगे चलकर पढ़ने या फिर काम करने की संभावना है। इनके लिए देश में 272 विश्वविद्यालय और लगभग 17 हजार महाविद्यालय हैं। कुल छात्रों में महज नौ फीसदी उच्च शिक्षा लेते हैं। एक अनुमान के अनुसार आने वाले सालों में इस स्तर पर शिक्षा लेने वालों की संख्या वर्तमान की एक करोड़ 10 लाख से बढ़कर दो करोड़ 30 लाख पहुंच जाएगी।
सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान सात करोड़ नए रोजगार सृजित करने का लक्ष्य रखा है। साफ है कि भारी भरकम आबादी के बावजूद देश के सामने बढ़ती मांग के अनुपात में प्रशिक्षित मानव संसाधन की विकट समस्या मुंह बाए खड़ी है। वर्तमान परिदृश्य मानव संसाधन विकास के गुणात्मक और संख्यात्मक दोनों ही पहलुओं में खामी को इंगित करता है।
किसी अनगढ़ किशोर को उपयोगी मानव संसाधन के रूप में बदलने में लगने वाले समय के बारे में अभी हमने सोचा तक नहीं है। इस समय में तभी कमी लाई जा सकती है जब हम संबंधित मानव संसाधन का उपयोग करने वाले संगठनों व उद्योगों तथा शिक्षण संस्थानों के बीच निकट संपर्क कायम करें। इस संदर्भ में मुख्य रूप से ध्यान रखी जाने वाली कुछ बातें इस प्रकार हैं:
1. पढ़ाई पूरी करने और उद्योगों की जरूरत के मुताबिक काम करने के काबिल बनने में लगने वाले समय में कटौती करने की जरूरत है।
2. व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षण की प्रक्रिया सृजनात्मकता को प्रोत्साहन देने वाली हो।
3. सभी शाखाओं में प्री-यूनिवर्सिटी स्तर पर एप्रेंटिसशिप प्रणाली विकसित की जाए।
4. बदलते परिदृश्य में छोटे शहरों को भी भागीदार बनाया जाए।
5. सभी जगह गुणवत्तायुक्त शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए आईआईएम और आईआईटी सरीखे शीर्ष संस्थानों के बीच फैकल्टी का आदान-प्रदान किया जाए।
ऐसी प्रणाली विकसित करके मानव-वर्षो के रूप में काफी बचत की जा सकती है।
उल्लेखनीय है कि जर्मनी में अपनाए जा रहे तथाकथित सैंडविच पाठ्यक्रमों के बहुत अच्छे परिणाम आ रहे हैं। वर्तमान आंकड़ों के आधार पर यदि हम क्रमिक रूप से निम्नलिखित तरीके से यह व्यवस्था लागू करें तो प्रशिक्षण के समय में खासी कमी लाई जा सकती है। उपरोक्त मॉडल अपनाकर 2007-2012 की अवधि में मोटे तौर पर कुल छह करोड़ मानव वर्षो तक की बचत की जा सकती है और समाज को सही तरीके से प्रशिक्षित लोगों की एक विशाल अतिरिक्त फौज मिल सकती है।
इस अवधारणा पर चर्चा आगे बढ़ाने के पहले निम्नलिखित बातों पर विचार किया जाना जरूरी है:
1. क्या हम अपनी शिक्षा प्रणाली को सेवा प्रदाता और समाज को सेवा उपभोक्ता के रूप में परिभाषित कर सकते हैं?
2. क्या उद्योग, सेवा और कृषि क्षेत्र शिक्षा प्रणाली से सीधे अंतर-संबंध बना सकते हैं और शिक्षा प्रणाली से मिलने वाले संसाधनों की गुणवत्ता परिभाषित कर सकते हैं?
3. क्या ग्राहक या उपभोक्ता व्यावहारिक और नैतिक रूप से शिक्षा प्रणाली में भागीदार हो सकते हैं?
4. यह प्रणाली अपनाने से समाज को प्रशिक्षित और कुशल मानव संसाधन मिलने में समय की जो बचत होगी क्या उसका मौद्रिक आकलन किया जा सकता है और क्या उस धन का शिक्षा में निवेश किया जा सकता है?
5. क्या उपरोक्त प्रणाली से किसी बच्चे को अपनी पसंद और रुचि के क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर ज्यादा स्पष्ट रूप से उपलब्ध हो सकेंगे?
6. क्या इस मॉडल से विशेषज्ञ ज्यादा तैयार होंगे मगर सभी तरह के काम की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने वाले कम तैयार होंगे?
7. क्या संसाधनों और संरचना के बीच तालमेल बैठाना संभव होगा?
भारत आज भारी सामाजिक-आर्थिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। नई चुनौतियां का सामना करने के लिए हमें नए समाधान तलाशने हैं। स्कूलों में व्यावहारिक व उपयोगी शिक्षा की चर्चा पहले ही शुरू हो चुकी है। ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में समय बचाने की अवधारणा को अपनाया जाना किसी भी तरह असामयिक नहीं है।
एमडी, सैंडविक इंडिया लिमिडेट, पुणो।
सह-लेखक संजय बसु, पूर्व प्रोफेसर, आईआईटी, खड्गपुर