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संत सिपाही थे गुरु गोबिन्द सिंह

जयंती विशेष. हिंदुस्तान को ऐतिहासिक मोड़ देने में राष्ट्रनायक गुरु गोबिन्द सिंह जी की विशेष भूमिका है। अत्याचार एवं जुल्म का प्रतिरोध करने के लिए जिस खालसे का उन्होंने सृजन किया, भविष्य में उसका प्रभाव भारतीय इतिहास में नजर आया। उनके लिए इंसान की एक ही जाति थी, मानवता। गुरु जी ने ऐसा जीवन दर्शन दिया जिसका पहला पाठ धर्म निरपेक्षता से जुड़ा हुआ था।

वे दार्शनिक एवं भारतीय भाषाओं के ज्ञाता थे। अरबी-फारसी, संस्कृत, हिंदी, पंजाबी, अवधी, ब्रज आदि भाषाओं पर उनका अधिकार था। आनंदपुर साहिब एवं पांउटा साहिब में उन्होंने नए साहित्य सृजन की जमीन तैयार की। उनके विद्या दरबार में भारतीय भाषाओं के 52 कवि थे।

इन सभी ने गुरु जी के व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर अमर संस्कृत भारतीय साहित्य का हिंदी एवं पंजाबी में अनुवाद किया। यह भारतीय साहित्य का पुनर्सृजन था। भक्ति के नए अर्थ आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित करने लगे। भक्ति कर्म से जुड़ी और कर्म राष्ट्रीय दुख-सुख का हिस्सा बना। गुरु जी द्वारा स्थापित सिख दर्शन और विचारधारा ने विश्व संस्कृति में नए अध्याय जोड़े।

13 अप्रैल 1699 में वैसाखी के मौके पर गुरु जी ने जिस खालसे का निर्माण किया वह गुरमुख भी था तथा अन्याय से सीधा टकराने की शक्ति भी रखता था। बेटों की शहादत पर गुरु जी ने कहा था कि मुझे अपने चार बेटों की कुर्बानी का दुख इसलिए नहीं है क्योंकि मेरे हजारों बेटे राष्ट्र के लिए जीवित हैं।

खालसा पंथ में नैतिकता एवं सच्चई के प्रति उदारता का संचार करने के लिए गुरु जी ने पहले पांच प्यारों को अमृत छकाया फिर उसी में से स्वयं अमृत का पान किया तथा एक हो गए। गुरु जी ने खालसा को अपना खास रूप कहकर पुकारा। खालसा में यह आस्था भी दृढ़ है कि मेरा अध्यात्म चिंतन खालसा में निवास करता है।

वास्तव में यह जिंदगी का नया समाजशास्त्र था जिसका निर्माण गुरु जी की दिव्य दृष्टि से हुआ। भारतीयों में सोई हुई शक्ति को गुरु जी ने फिर से जगाया ही नहीं, बल्कि उसे एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा भी बनाया जिससे वे अपनी गुरु जी के पावन जन्मदिवस पर हम उन्हें शत-शत प्रणाम करते हैं।

लेखक गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर में हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं।





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