कई मौकों पर बीता वर्ष मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह छोड़कर गया, उसे देखते हुए अब वक्त आ गया है जब खुलकर बोलने की जरूरत है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया टीआरपी की जिस दौड़ में शामिल हो गया है, उससे विश्वसनीयता में गिरावट आ रही है। लोकतंत्र के जिस चौथे स्तंभ को कल तक इज्जत की नजरों से देखा जाता था, उसमें आज कमी आई है। 
कमोबेश अंग्रेजी तो तब भी कुछ बेहतर स्थिति में है, लेकिन हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। ऐसा भी नहीं है कि स्थिति हाथ से निकल चुकी है। अभी भी तस्वीर बहुत ज्यादा बदल सकती है, लेकिन इसके लिए समर्पण के साथ काम करना होगा। साथ ही विश्वसनीयता को नए सिरे से बहाल करना होगा। उसके बाद ही मीडिया को गंभीरता से लिया जाएगा।
अगर अंग्रेजी और हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अलग-अलग बात करें तो यह बात हिंदी पर अधिक लागू होती है। एक बात ध्यान रखनी होगी कि हिंदी और अंग्रेजी के दर्शक अलग-अलग हैं। अंग्रेजी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दर्शक परिपक्व और समझदार है, जबकि हिंदी के साथ अभी ऐसा नहीं है। यह फर्क हिंदी-अंग्रेजी चैनलों द्वारा परोसी जा रही सामग्री से भी स्पष्ट समझा जा सकता है।
उस पर रही-सही कसर खालिस न्यूज चैनल पर इंटरटेनमेंट के घालमेल ने पूरी कर दी है। पत्रकारिता में शुरुआत से ही व्यंग्य की गुंजाइश रही है। अब जो परोसा जा रहा है वह व्यंग्य नहीं है। वह विशुद्ध रूप से हास्य है और हास्य, व्यंग्य का स्थान कभी भी नहीं ले सकता। वैसे मेरे विचार से इसका निर्धारण स्वयं चैनलों को ही करना होगा कि वे किस तरह का कंटेंट परोसते हैं।
यह भी जरूर एक सच है कि पिछले वर्ष न्यूज चैनलों पर मनोरंजन का जोरदार प्रभाव रहा। नई फिल्मों के लांचिंग पैड बने विभिन्न चैनलों पर रियालिटी शो भी खबरों के बीच प्रमुखता से स्थान बनाए रहे। मेरे विचार से मीडिया को व्यंग्य का सहारा लेना चाहिए, हास्य का नहीं।
एनडीटीवी ने ही ‘गुस्ताखी माफ’ कार्यक्रम के जरिये व्यंग्य को लेकर एक नया प्रयोग किया जो सफल रहा। जरूरत कुछ ऐसे ही व्यंग्यात्मक कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देने की है। ये दर्शकों को हल्के-फुल्के ढंग से जागरूक बनाने में सफल रहेंगे।
बीते वर्ष हास्य और ग्लैमर की अधिकता से अगर लोग कहने लगें कि न्यूज चैनल देखने से ही इंटरटेनमेंट हो रहा है तो आप न्यूज-मनोरंजन के घालमेल की परिणति को बेहतर समझ सकते हैं। जहां तक मुझे लगता है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में व्यंग्य की शुरुआत शेखर ने की थी, जो बाद में हास्य में तब्दील हो गई।
यह घालमेल एक बहस का मुद्दा है और देखना यह है कि चैनल इसके सहारे कितनी दूर तक जा सकते हैं। न्यूज चैनलों की अपनी एक अलग छवि होती है और भारतीय चैनल अभी इस क्रम में प्रयोगधर्मी साबित हो रहे हैं। फिर कहूंगा कि इसके मूल में भी वही टीआरपी की अंधी दौड़ है, जो उन्हें यहां-वहां भटकने को मजबूर कर रही है।
ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर भी एक खेल सा चल रहा है। मैं व्यक्तिगत स्तर पर इस बारे में यही कहना चाहूंगा कि चैनल को गंभीरता के साथ सोचना होगा और फिर दिखाना होगा कि ब्रेकिंग न्यूज वास्तव में है क्या। इसके अलावा पिछले वर्ष मीडिया का जिसने सर्वाधिक मान- मर्दन किया, मेरे लिहाज से वह निहित स्वार्थवश अंजाम दिए गए स्टिंग ऑपरेशन थे।
जिस तरह उमा खुराना का स्टिंग किया गया उसने तो इस तरह की पत्रकारिता की पवित्रता को ही दागदार कर दिया। यहां तक कि आवाजें उठने लगीं कि चैनलों पर नियंत्रण रखने के लिए एक संस्था का होना जरूरी है। स्टिंग ऑपरेशन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मीडिया द्वारा स्वीकृत पत्रकारिता है। हां, वह किस मकसद से हो रही है यह विचारणीय मुद्दा है। स्टिंग ऑपरेशन सही चीजों के प्रति लोगों को आगाह करता है।
ऐसे में चंद स्वार्थ प्रेरित ऑपरेशन न सिर्फ स्टिंग ऑपरेशन के मकसद, बल्कि उसकी महत्ता को ही खत्म कर देंगे। सबसे बड़ी बात कि सरकार को इसकी आड़ में इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की आवाज दबाने का मौका मिल जाएगा।
इस खतरे को भांपकर ही न्यूज ब्रॉडकस्टर एसोसिएशन ने साल भीतर एक आचार संहिता बनाने का आश्वासन दिया है। फिर भी यह जिम्मेदारी चैनल की ही बनती है कि वह ब्रेकिंग न्यूज समेत स्टिंग ऑपरेशन की पवित्रता और मकसद से भटके नहीं। मैं फिर कहना चाहूंगा कि टीआरपी की दौड़ में अपनी विश्वसनीयता नहीं खोए।
पश्चिमी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तुलना में भारतीय मीडिया अभी बहुत ज्यादा युवा है। बमुश्किल 10-15 वर्ष ही पुराना है। फिर भी उसने कई मोर्चो पर अपनी भूमिका को बढ़-चढ़कर अंजाम दिया है। भले ही वह कारगिल रहा हो, गुजरात दंगे रहे हों या सुनामी रहा हो, उसने इन मोर्चो पर पूरी गंभीरता और समर्पण का परिचय दिया है।
एक लिहाज से भारतीय मीडिया परिपक्व हो रहा है, लेकिन अभी पूरी तरह से मैच्योर होने में वक्त लगेगा। जिस तरह पश्चिम में न्यूजरीडर पेरिस हिल्टन की रिहाई की खबर को सुबह के बुलेटिन में पढ़ने से इंकार कर देती है, वह समय आने में थोड़ा वक्त लगेगा। हां, इतना विश्वास जरूर है कि इस स्थिति या मैच्योरिटी को प्राप्त करने में बहुत ज्यादा वक्त है नहीं।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ही तर्ज पर एफएम चैनलों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। इन सभी का मूलमंत्र अधिक से अधिक इंटरेक्टिव बन युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करना है। इसी वर्ष 97 के लगभग और नए एफएम चैनल आने वाले हैं। हालांकि इनके आने से किसी भी एक को दूसरे से फर्क नहीं पड़ेगा। बशर्ते वह मनोरंजन को जानकारी के साथ बेहतर संयोजन में प्रस्तुत करता रहे।
एफएम ही क्यों, मोबाइल और इंटरनेट के क्षेत्र में भी तेजी से विकास होने जा रहा है। ये सभी एक चुनौती बनेंगे। अच्छी बात यह है कि इस वर्ष भारतीय मीडिया की तस्वीर बहुत रंगीन है। उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष मीडिया में बहुत तेजी से बदलाव देखने में आएगा। यह देखने की बात होगी कि लोग इस बदलाव को कितना और किस हद तक स्वीकार करते हैं, लेकिन इतना तय है कि भारतीय मीडिया के लिए यह वर्ष काफी सुनहरा साबित होगा।
इसमें एक अच्छी बात यह रहेगी कि प्रिंट मीडिया की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ने जा रहा है। तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक चैनल कभी भी प्रिंट का स्थान नहीं ले पाएंगे। प्रिंट मीडिया अपनी सीमाओं के बावजूद काफी तेजी से बढ़ रहा है और उसकी यह बढ़त जारी रहेगी।
वल्र्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूजपेपर्स और भारतीय प्रेस रजिस्ट्रार की रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक करती हैं। भारतीय प्रिंट मीडिया खासकर भाषाई प्रेस ने अंग्रेजी को कहीं पीछे छोड़ दिया है। एनआरएस और आईआरएस के आंकड़े इसके गवाह हैं। यह तब हो रहा है जब यूरोप और अमेरिका का प्रिंट मीडिया ढलान पर है। इसीलिए मुझे यह वर्ष भारतीय मीडिया के लिए कहीं ज्यादा सुनहरा और रंगीन दिख रहा है।
लेखक एनडीटीवी में कार्यरत वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं।