पश्चिम में आयुर्वेद, योग, शास्त्रीय संगीत, भारतीय कला और भारतीय लेखकों की अंग्रेजी में लिखी किताबों की लहर चल रही है। यह लहर मैक्समूलर की भारतीय प्राचीन शास्त्रों में रुचि से अलग है। भारतीय शादियों के रीति-रिवाज भी वहां कौतुक से देखे जाते हैं। शायद इसीलिए मीरा नायर की ‘मानसून वेडिंग’ को अप्रवासी भारतीय दर्शकों से अधिक पश्चिम के दर्शक मिले और ‘नेमसेक’ को भी सराहा गया है।
इसी लोकप्रिय लहर का एक हिस्सा भारतीय सिनेमा भी है। फ्रांस की प्रतिष्ठित ओपेरा कंपनी ने संजय लीला भंसाली की ‘देवदास’ देखकर उन्हें फ्रैंच भाषा का ओपेरा निर्देशित करने के लिए आमंत्रित किया है और शायद इसी की रिहर्सल स्वरूप उन्होंने ‘सावरिया’ को ओपेरा शैली में गढ़ा।
शेखर कपूर की अंग्रेजी भाषा में बनाई गई एलिजाबेथ भाग एक में भारतीय सिनेमा के मुहावरे की झलक मौजूद थी। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शकीरा ने अपने एक नृत्य के लिए फरहा खान की मदद ली।
हॉलीवुड के सिनेमा ने अपनी मजबूत वितरण और प्रदर्शन व्यवस्था की सहायता से दुनिया के सभी देशों में अपने अफीमी मनोरंजन की लत डाल दी है। उन्हें भारत में आशातीत सफलता नहीं मिली। उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं में डब करके भी अपनी फिल्में यहां प्रदर्शित की परंतु मनोरंजन के भारतीय किले में वे सेंध नहीं मार पा रहे हैं।
सबसे अधिक दर्शकों के देश में यह विफलता उन्हें सहन नहीं हो रही है। उनके अफीमी सिनेमा का भरपूर असर भारतीय दर्शक पर नहीं हो रहा है, जिसने अपनी घुट्टी में ही भारतीय नाच-गाने और मसाले वाली फिल्मों को ही पिया है। यह प्रकरण कुछ मां के दूध की ही तरह है जिससे अधिक शक्तिशाली कुछ नहीं होता।
हमारे तर्कहीन नाच-गाने और बगैर सिर-पैर के मनोरंजन में एक अपनी मौलिक ऊर्जा है जिसका जादू सिर चढ़ कर बोलता है। रजनीकांत की फिल्में जापान जैसे देश में सफल रही हैं। अकिरा कुरोसोवा कब्र में करवटें बदल रहे हैं।
दरअसल हमारे फिल्मकार और कलाकार पूरी शिद्दत और विश्वास के साथ नाच-गाना प्रस्तुत करते हैं और मसाले को भी विटामिन की संजीदगी देते हैं। यह कन्विक्शन ही उसे स्वीकार करने लायक बना देता है। इस सृजन प्रक्रिया को समझने के लिए ही सोनी इंटरनेशनल ने ‘सावरिया’ में धन लगाया और सुनते हैं कि अब वार्नर का धन अक्षय कुमार अभिनीत ‘चांदनी चौक टू चाइना’ में लगा है।
हॉलीवुड के ब्रेड पिट के एजेंट ने रितिक का काम भी ले लिया है, क्योंकि इतने कम दाम में इतना समर्पित कलाकार कहां मिलेगा। काटरून विद्या के पुरौधा डिज्ने के हुक्मरानों ने यश चोपड़ा को एक काटरून फिल्म बनाने का ठेका दिया है। यह ऐसा लगता है मानो कोई पांच सितारा होटल सड़क छाप ठिए के कबाब को थोड़ा सा गर्म करके अपने श्रेष्ठि वर्ग के ग्राहकों को परोस रहा हो।
दरअसल भारत के कलाकार और तकनीशियनों के मेहनताने हॉलीवुड के मुकाबले बमुश्किल बीस प्रतिशत हैं। अत: ऑउट सोसिर्ंग सही आर्थिक नीति है। भारतीयता की लहर की लोकप्रियता के पीछे ये ठोस आर्थिक कारण भी है। फामरूला फिल्म को हमेशा खोटा सिक्का या बिगड़ा हुआ बेटा माना गया और आज बाजार में वही चल पड़ा।