सम्पादकीय. स्वस्थ और सोद्देश्य मनोरंजन किसी भी स्वस्थ व समृद्ध समाज की मूलभूत आवश्यकता भी होता है और पहचान भी। किसी व्यक्ति या समाज को आनंदित या प्रफुल्लित करने और तनाव से मुक्ति दिलाने वाला कोई भी कार्यक्रम, कला-प्रदर्शन या गतिविधि मनोरंजन कहलाती है। समाज का शायद ही कोई तबका ऐसा हो जिसके पास मनोरंजन के अपने साधन, अपने तरीके नहीं हों।
लोक-नृत्य, लोक-गीत, नाटक, तमाशा, कठपुतली, नौटंकी, सर्कस, कबूतरबाजी, तीतरबाजी आदि विधाएं इसके पारंपरिक साधन रहे हैं तो सिनेमा, टेलीविजन और कंप्यूटर गेम्स इसके आधुनिक साधन हैं। मनोरंजन के कुछ साधनों का दायरा देश, क्षेत्र या समाज विशेष में सीमित है तो सिनेमा, टेलीविजन और कंप्यूटर गेम्स जैसे साधन सार्वदेशिक और सर्वव्यापी हैं।
मनोरंजन के साधनों का महत्व तब और बढ़ जाता है जब कोई देश सामूहिक रूप से अवसाद या तनाव का शिकार होता है और उसे इस स्थिति से बाहर निकालने की जरूरत होती है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अवसाद में डूबे अपने नागरिकों के मनोरंजन के लिए अमेरिका द्वारा इसे एक व्यवस्थित उद्योग के रूप में बढ़ावा देना इसका उदाहरण है।
उस दौर में अपने नागरिकों को मनोरंजन के अधिकाधिक साधन सुलभ कराना अमेरिका के नीति-निर्माताओं की शीर्ष प्राथमिकता बन गया और इसके लिए उन्होंने हर तरह की कर रियायतें उपलब्ध कराईं। हॉलीवुड के सिनेमा उद्योग और एम्यूजमेंट पार्को ने इसी दौर में अपनी वैश्विक पहचान बनाई।
टेलीविजन के प्रचार-प्रसार ने तो मनोरंजन की दुनियाभर की विधाओं को उनके दृश्य-श्रव्य रूप में घर-घर पहुंचा दिया। दूसरे शब्दों में, टेलीविजन ने मनोरंजन के तमाम रूपों को अपने में समाहित कर लिया। हालांकिवह मनोरंजन के कई परंपरागत साधनों के दम तोड़ देने का कारण भी बना।
जहां तक भारत का सवाल है, आजादी के तत्काल बाद के दौर में हमारा सिनेमा देशप्रेम और समाजवाद का संदेशवाहक-सा बन गया और उसके जरिये सामाजिक बदलाव की अनगढ़ कोशिश की गई, जो कारगर नहीं हुई।
कारण, सिनेमा या नाटक देखने वाले लोगों का एक बड़ा तबका उपदेश सुनने, सामाजिक बदलाव की नसीहत लेने या फिर तनाव का शिकार होने के लिए समय और पैसे खर्च नहीं करता है। वह विशुद्ध मनोरंजन के लिए सिनेमा देखने जाता है। बाद में विशुद्ध मनोरंजन करने वाली फिल्मों का दौर भी आया।
आज जब अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में हम नई उड़ानें भर रहे हैं, तब हमारा सिनेमा भी शिद्दत के साथ समय और लोगों की नब्ज पर पकड़ बनाने में जुटा है। इसी वजह से उसे क्रमिक रूप से वैश्विक पहचान भी मिलने लगी है। और चूंकि सिनेमा मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय साधन है इसलिए हम कम से कम इस क्षेत्र में दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलने का गर्व और संतोष कर सकते हैं।