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मंत्रियों-अफसरों पर लुटाए लाखों

ग्वालियर. एसएसए (सर्व शिक्षा अभियान) न हुआ अलादीन का चिराग हो गया। आका का आदेश हुआ नहीं कि मनचाही चीज हाजिर। साहब को घुमने जाना है तो एसएसए, मेम साहब को शॉपिंग करनी है तो एसएसए और साहब के बच्चों को लेटेस्ट कम्प्यूटर गेम्स चाहिए तो एसएसए। जी, हां यह आपको पढ़ने में भले ही अटपटा लग रहा हो लेकिन कागजी आंकड़ों की बाजीगरी के विपरीत एसएसए की यथागति यही है।

एसएसए का पूरा सिस्टम ही उधार की व्यवस्था, अर्थात डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) और संविदा (निश्चित समय के लिए ठेका) पर पदस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है। इनमें भी बहुसंख्य वे शासकीय सेवक हैं जिन्हें अपनी काबलियत से ऊंचा पद और अधिक वेतन एसएसए में नसीब हो रहा है। मिशन टाइमफ्रेम (2010 तक) है इसलिए लोगों का जुड़ाव इससे दिल की बजाय पैसों तक ही सीमित है। स्कूल शिक्षा विभाग के मूल ढांचे को तहस-नहस करते हुए राज्य शिक्षा केंद्र के ढांचे को स्थापित किया गया है। जिला स्तर पर देखें तो जिला शिक्षा केंद्र की कमान जिला परियोजना समन्वयक (डीपीसी) के हाथ में हैं लेकिन वह अपनी सुप्रीम अथोरिटी जिला मिशन संचालक (कलेक्टर) और जिला प्रोजेक्ट डायरक्टर (सीईओ, जिला पंचायत) के हाथ की कठपुतली बनकर रह गया है।

डीपीसी का अधिकांश समय इन दोनों अधिकारियों के पास अपनी फाइलों और कामकाज के एप्रुवल में ही गुजर जाता है। कहने को डीपीसी कार्यालयों में सेटअप के अनुरूप स्टाफ पदस्थ है लेकिन वह कार्यालय पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने की आड़ में अधिकांश कार्यो को स्वयं में ही केंद्रीयकृत रखता है। एसएसए में भले ही पारदर्शिता के कितने दावे-प्रतिदावे किए जाएं, पर हकीकत यह है कि डीपीसी कार्यालय के अधिकारियों-कर्मचारियों तक को 90 फीसदी से अधिक कार्यो की जानकारी नहीं होती। किससे क्या लिया, किसको क्या दिया, कहां से पैसा आया, कहां गया, आदि पर डीपीसी का डेरा होता है।

इस केंद्रीयकृत व्यवस्था के चलते उसे कैसे-कैसे समझौते करना पड़ते हैं, यह भी कम रोचक नहीं है। ग्वालियर अंचल के एक जिले में पदस्थ रहे राज्य प्रशासनिक सेवा के एक अफसर को पूर परिवार के साथ दक्षिण राज्य के एक पिकनिक स्पाट पर जाना था, तो उन्होंने डीपीसी को टिकट व अन्य इंतजाम का फरमान थमा दिया। ऐसे ही ग्वालियर में एक अधिकारी ने बच्चों को पढ़ाने के लिए कम्प्यूटर पहले तो अपने घर की निजी लाइब्रेरी में लगवाया और फिर बाद में दो रिश्तेदारों को कम्प्यूटर दिलवाएा। चंबल अंचल के एक आला प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी के ज्वैलरी शौक को ग्वालियर के सराफा बाजार में संबंधित जिले के डीपीसी को दीपावली से कुछ रोज पहले हजारों रुपये खर्च करके पूरा कराना पड़ा।

ऐसा नहीं है कि उपकृत करने का सिलसिला अफसरों तक ही सीमित है। कुछ समय पहले तक शालेय शिक्षा विभाग का कामकाज देखने वाले जिले के ही एक मंत्री के साथ ही प्रभारी मंत्री को सरकारी वाहन के अतिरिक्त एक वाहन डीपीसी ग्वालियर कार्यालय से उपलब्ध कराया गया। यह दोनों वाहन लगभग तीन साल तक अवैधानिक रूप से एसएसए फंड पर मंत्रियों की सेवाओं में दौड़ते रहे और इन पर लगभग पंद्रह लाख रुपये (डीजल व किराया समेत) खर्च हो गए। महालेखाकार मध्यप्रदेश की आडिट टीम की पैनी नजर ने इस मामले को पकड़ा है, मगर सक्षम अधिकारी इस व्यय को एसएसए की मानीटरिंग का नाम देकर लीपापोती करने का प्रयास कर रहे हैं। वैसे चालकों द्वारा तैयार वाहनों की लॉग बुक अधिकारियों की करनी की चुगली करती नजर आती है। यहां बता दें कि किसी भी अधिकारी को लंबी दूरी के लिए लक्जरी वाहन की जरूरत होती है, तो सामान्यत: वह एसएसए का ही सहारा लेता है।

यह स्थिति घूमने-फिरने तक ही सीमित नहीं है। अधिकांश जिलों में विभागीय या प्रभारी मंत्री के आगमन की स्थिति में उनके सहयोगियों के लिए व्यवस्थाएं जुटाने की जिम्मेदारी भी सर्व शिक्षा अभियान से जुड़े अफसरों की होती है। यह व्यवस्थाएं खान-पान, आवास और अपवाद की स्थिति में मदिरा तक पहुंच जाती हैं।

ग्वालियर अंचल के एक डीपीसी कार्यालय में दो महिला कर्मचारियों का शक्ति प्रदर्शन किसी से छिपा नहीं है। एक महिला भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी की नजदीकी, तो दूसरी महिला की निकटता क्षेत्र के एक प्रभावी राजनेता से थी। दोनों के बीच ताकतवार कौन?, की होड़ चली और इस चटखारयुक्त होड़ में उनके आकाओं की भी सक्रिय भूमिका रही। मजे की बात यह कि उन्हें ऐसे पदों की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसकी वे अपने मूल पद व योग्यता के लिहाज से पात्र ही नहीं थीं। यहां बता दें कि इस दौर में संबंधित जिले के डीपीसी ने मनमाना रवैया अपनाते हुए कार्यालय की मर्यादा को ही बट्टा नहीं लगाया, बल्कि एसएसए फंड का भी खुलकर अपव्यय किया।

डीपीसी की कुर्सी

एसएसए में पैसा बरस रहा है, इसलिए डीपीसी की कुर्सी पर अपने पसंद का अधिकारी बैठाने के लिए विधायक व मंत्री ही अपनी गोटियां नहीं बैठाते, बल्कि कुछ प्रशासनिक अधिकारी भी इस खेल में खुलकर हिस्सा लेते हैं। अंचल के कुछ जिलों में एक साल के भीतर दो से तीन डीपीसी बदले जा चुके हैं। सूत्रों की मानें तो प्रदेश सरकार के एक मंत्री के कार्यकाल में तो इस पद के लिए खुलकर बोलियां लगाई गईं। जब शहरी क्षेत्र के हायर सेकंडरी स्कूल में प्राचार्य की कुर्सी का रट 70 हजार रुपये हो, तो डीपीसी की कुर्सी के रट का अनुमान आप स्वयं ही लगा सकते हैं।

कलेक्टर की हठ

अंचल के एक कलेक्टर ने एसएसए के नाम पर जमकर चांदी काटी। अपने पद का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने मुम्बई से 27 लाख रुपये की एक ऐसी मशीन खरीदने का प्रस्ताव दे दिया, जिसका ताल्लुक किसी भी रूप में बच्चों की शिक्षा से नहीं था। उनके प्रस्ताव पर डीपीसी ने नियमों की दुहाई दी, तो उन्होंने अगले ही दिन डीपीसी कार्यालय पर छापा मार दिया और एक साथ आधा दर्जन से अधिक कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया। उक्त कलेक्टर महोदय की जिले से रवानगी के बाद मामला कमिश्नर तक पहुंचा, तो उन्होंने सस्पेंड कर्मचारियों को बहाल किया।





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