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बेपरवाह पुलिस, बेबस कानून

अजमेर. ajmer अदालत है, कानून है और कानून की पालना कराने के लिए जिम्मेदार एजेंसी पुलिस भी है। फिर भी चूक हो जाती है? सरकार ने अदालतों में पैरोकार तैनात कर रखे हैं। अनुसंधान के दौरान पुलिस उनसे राय ले सकती है, लेकिन तमाम व्यवस्थाओं के बावजूद कभी-कभी तो संगीन मामलों में भी मुजरिमों को बचाव की गलियां मिल जाती हैं।

गौरतलब यह है कि कलेक्टर की अध्यक्षता में बनी तीन सदस्यीय निरीक्षण समिति की आज तक बैठकें ही नहीं हरुई, जबकि सरकार ने इन बैठकों में क्राइम की समीक्षा के आदेश दे रखे हैं। कानून के प्रावधान, प्रावधानों की पालना, पालना में चूक और चूक के असर पर ‘भास्कर’ की पड़ताल का निष्कर्ष यह रहा कि जब जिम्मेदार लोग जानबूझ कर या अनजाने में बेपरवाह हो जाते हैं तो कानून बेबस हो जाता है।

‘गृह सचिव की सदारत में 4 अक्टूबर 1999 को एक बैठक हुई थी। जिसमें अदालती कार्रवाई में तेजी लाने और अपराधियों को सजा दिलाने में आ रही कठिनाइयां दूर करने के लिए निरीक्षण कमेटी गठित करने का निर्णय किया गया। कलेक्टर की अध्यक्षता में बनी कमेटी में एसपी और लोक अभियोजक को सदस्य बनाया गया।

गृह विभाग ने 13 फरवरी 2000 को सभी कलेक्टरों को हर तीन महीने में निरीक्षण कमेटी की बैठक बुलाने और लिए गए निर्णयों से सरकार को अवगत कराने के आदेश दिए। अजमेर में बैठकों के लिए कई तारीखें तय हरुई। लेकिन निरीक्षण समिति की बैठकएक भी नहीं हुई।

बहुत खामियां
पुलिस के अनुसंधान में बहुत खामियां होती हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के बयानों पर हस्ताक्षर नहीं कराने का विशेषाधिकार है पुलिस के पास, लेकिन बयानों में भारी विरोधाभास होता है। हत्या जैसे संगीन अपराध में कातिल के रिश्तेदारों को ही गवाह बना लेते हैं। कलेक्शन ऑफ एवीडेंस, क्वालिटी ऑफ इन्वेस्टीगेशन बहुत खराब है।

इसका फायदा मुल्जिम को मिलता है। सम्मन या गिरफ्तारी वारंट तामील कराने में भी गंभीरता नहीं बरती जाती है। ऐसी बहुत सी खामियां हैं, जिन्हें निरीक्षण समिति की बैठकों के जरिये दूर किया जा सकता है।
-जफर अहमद,पूर्व लोक अभियोजक

बात करना बेमानी
2003 में सरकार ने परिपत्र जारी किया, जिसमें यह व्यवस्था की गई थी कि लोक अभियोजक और सहायक लोक अभियोजकों को अदालत संबंधी काम के लिए कांस्टेबल दिए जा सकते हैं। मुझे दो कांस्टेबल दिए गए। गुर्जर आंदोलन के बहाने एक हटा लिया गया। एसपी एस. सेंगाथिर से कहा तो उनका जवाब था कि अदालत में कांस्टेबल की क्या जरूरत है।

जिस पुलिस को यह नहीं पता कि अदालत में कांस्टेबल का क्या काम है, उससे मुकदमों में जांच के दौरान छोड़ दी जाने वाली खामियों की गंभीरता के बारे में बात करना बेमानी है। पुलिस ने यह लकीर खींच ली है कि चालान पेश करने तक ही उसकी जिम्मेदारी है। केस ऑफीसर स्कीम में असफल होने वाले मामलों की समीक्षा कानूनी नजरिए से होती ही नहीं है। खुद पुलिस ही समीक्षा कर लेती है। बार-बार लिखने पर भी एसपी-कलेक्टर, पीपी के साथ क्राइम समीक्षा नहीं करते।
-अशोक तेजवानी, विशेष लोक अभियोजक, फास्ट ट्रैक अदालत

नहीं की कोशिश
सरकारी वकील को अपराधी को सजा दिलाने में क्या-क्या परेशानी आती है, यह जानने का कभी प्रयास ही नहीं किया गया। कलेक्टर-एसपी बैठकें तय करते हैं, लेकिन स्थगित कर दी जाती हैं। एनडीपीएस एक्ट के बरी वाले मामलों की तह में जाएं तो साफ हो जाएगा कि ज्यादातर अभियुक्त तकनीकी आधार पर छूट जाते हैं। तकनीकी पहलुओं के बारे में सरकारी वकील ही बता सकता है।
-रामस्वरूप, लोक अभियोजक, जिला एवं सत्र अदालत

सिर्फ आंकड़ेबाजी
मार्च 1999 से 2005 तक एससी-एसटी अदालत में विशेष लोक अभियोजक रहा, लेकिन एक भी दिन क्राइम समीक्षा के लिए कलेक्टर या एसपी स्तर पर बैठक नहीं हुई। जो बैठकें होती हैं उनमें सिर्फ लंबित प्रकरणों की आंकड़ेबाजी ही चलती रहती है। ट्रायल कोर्ट के लोक अभियोजक या विशेष लोक अभियोजकों से तो राय लेना भी जरूरी नहीं समझा जाता। अनुसंधान के दौरान तो कानूनी राय शायद ही किसी प्रकरण में ली गई हो।
-मंजूर अली, पूर्व विशेष लोक अभियोजक

अब मीटिंग लेंगे
भविष्य में पीपी, एपीपी के साथ रोटेशन से क्राइम समीक्षा बैठक की जाएगी। महिला उत्पीड़न, दहेज प्रकरणों और एससी-एसटी के प्रकरणों की समीक्षा बैठकें ली जाती हैं।
-नवीन महाजन, कलेक्टर

फैसला
अपराधियों को सजा सुनिश्चित कराने के लिए 4 अक्टूबर 1999 को कमेटी बनी।

मकसद
अदालत संबंधी कार्रवाई में तेजी लाना और कानून की पालना में होने वाली चूक से बचना।

कवायद
13 फरवरी ’2000, गृह विभाग ने सभी कलेक्टरों को हर तीन महीने में निरीक्षण कमेटी की बैठक बुलाने के निर्देश दिए।

अंजाम
कई बार तारीख तय होने के बावजूद अजमेर में अभी तक एक बार भी निरीक्षण कमेटी की बैठक नहीं हो पाई।बीवी बच्चों की हत्या के मामले में उम्रकैद भुगत रहे मांगीलाल ने साथी बंदी शिवराज उर्फ श्योराज की हत्या कर दी। पुलिस ने भादसं की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज किया, लेकिन गिरफ्तारी धारा 303 के तहत की।

कानून : भादसं की धारा 303 को सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधिपतियों की बैंच असंवैधानिक ठहरा चुकी है। यह धारा 1983 से अस्तित्व में नहीं है। धारा 302 ही पर्याप्त थी, क्योंकि इसमें भी मृत्युदंड का प्रावधान है।

नतीजा: धारा 303 में सिर्फ मृत्युदंड का ही प्रावधान है, इस तथ्य की जानकारी मांगीलाल को थी। 27 नवंबर की सुबह उसने जेल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। बाद में पुलिस ने अपनी गलती सुधारी और धारा 302 के तहत एफआर पेश कर दी।

पंजाब के एक आतंकी की तलाश में पुलिस ने गंगानगर में छापा मारा। आतंकी नहीं मिला। छापे में पुलिस ने विदेशी रिवॉल्वर, खालिस्तान लिब्रेशन फंट्र के आपत्तिजनक दस्तावेज, कारतूस आदि बरामद हुए। वांछित व्यक्ति के भाई परमजीतसिंह, धरमजीतसिंह व दो अन्य कुलदीपसिंह, कारजसिंह आदि को गिरफ्तार कर लिया गया।

कानून : टाडा एक्ट के प्रावधानों के तहत मुल्जिम का जुर्म कबूल करने संबंधी बयान एसपी स्तर का अधिकारी रिकॉर्ड करता है और उस पर हस्ताक्षर भी वही करता है। इस प्रकरण में एसपी ने बयान रिकॉर्ड नहीं किए। बरामद रिवॉल्वर के बारे में एक्सपर्ट ने रिपोर्ट दी कि उस पर विदेशी मार्का नहीं है।

नतीजा : सभी आरोपी बरी, सरकार ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है।

डिस्कॉम के कर्मचारी नारायण पर पत्नी और पुत्र के साथ मिलकर महिलाकर्मी मंजू को जहर देकर मारने का आरोप था। पुलिस ने मृतका के पुत्र की शिकायत को नजरअंदाज कर हत्या का मामला दर्ज नहीं किया। अदालत के आदेश से एक साल बाद मुकदमा दर्ज हुआ। पुलिस 174 की कार्रवाई में मौत का नतीजा नहीं दे सकी और 302 के मामले में हत्या का उद्देश्य नहीं तलाश सकी।

कानून : हत्या का उद्देश्य अदालत के सामने स्पष्टत: लाया जाना चाहिए।

नतीजा : तीनों बरी, तफ्तीश में लापरवाही बरतने पर अदालत को पुलिस के खिलाफ तल्ख टिपप्णी करनी पड़ी।





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