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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior ग्वालियर. प्रदेश सरकार आपरशन हेडस्टार्ट योजना पर दस करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च कर चुकी है, इसके बावजूद सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए कम्प्यूटर दूर का दर्शन बना हुआ है। सुरक्षा के नाम पर कम्प्यूटर सेट्स कहीं अलमारी में कैद हैं, तो कहीं बिजली रुला रही है। आश्चर्यजनक यह कि अंचलभर में जहां 50 लाख रुपये से अधिक के कम्प्यूटर चोरी हो चुके हैं, वहीं 25 लाख रुपये के कम्प्यूटर सरकारी अफसरों की सेवा में हैं।
आपरशन हेडस्टार्ट कार्यक्रम अंचल के आठ जिलों में वर्ष 2000 से प्रभावी किया गया। प्रथम चार चरणों में 536 हेडस्टार्ट सेंटर (ग्वालियर जिले में 66, शिवपुरी जिले में 74, दतिया जिले में 75, गुना जिले में 47, अशोक नगर जिले में 40, मुरैना जिले में 79, भिंड जिले में 78 व श्योपुर जिले में 67) स्थापित किए। तीन कम्प्यूटर, तीन यूपीएस और एक प्रिंटर से लैस प्रति हेडस्टार्ट की स्थापना पर लगभग डेढ़ लाख रुपया खर्च किया गया। इस लिहाज से अब तक सात करोड़ 89 लाख रुपये के कम्प्यूटर अंचल में स्थापित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त वर्ष 2007-08 में प्रत्येक जिले में 10-10, कुल 80 केंद्र की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है। इन 80 केंद्रों पर भी डेढ़ लाख रुपये के हिसाब से एक करोड़ बीस लाख रुपये खर्च होंगे। इतना ही नहीं इनके रखरखाव के लिए प्रति सेंटर दस हजार रुपये के हिसाब से एक करोड़ 52 लाख 60 हजार रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
इसके अलावा दूसर चरण में स्थापित 326 हेडस्टार्ट सेंटरों के लिए बैटरी रिप्लेसमेंट के लिए 48 लाख 60 हजार रुपये (प्रति सेंटर 15 हजार रुपये) की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त हेडस्टार्ट सेंटर पर पदस्थ शिक्षकों की ट्रेनिंग पर भी प्रतिवर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। स्कूलों में हेडस्टार्ट कार्यक्रम के लिए इन्फास्ट्रक्चर (स्वच्छ व डस्टरहित रूम, फर्नीचर, बिजली कनेक्शन आदि) खड़ा करने पर भी लाखों रुपये खर्च किए गए हैं।
ग्वालियर अंचल में आधे से अधिक हेडस्टार्ट सेंटर विभिन्न कारणों के चलते बंद पड़े हैं लेकिन इनके लिए राज्य शिक्षा केंद्र से मिलने वाली मेंटीनेंस (रखरखाव) राशि संबंधित जिलों के डीपीसी व बीआरसीसी खर्च होना अवश्य दर्शा देते हैं। नियमानुसार तो हेडस्टार्ट सेंटर के वार्षिक रखरखाव का ठेका कराए जाने का प्रावधान है लेकिन अधिकांश जिलों में इसकी खानापूर्ति की जाती है और अधिकारी अपने स्तर पर ही मेंटीनेस की राशि को कागजों पर ही खुदबुर्द कर देते हैं।
दैनिक भास्कर ने जब विभिन्न जिलों में संचालित हेडस्टार्ट सेंटरों का भौतिक सत्यापन कराया तो कई चौंकाने वाले मामले प्रकाश में आए। श्योपुर जिले में 67 हेडस्टार्ट सेंटर हैं लेकिन इनमें से मात्र तीस सेंटर ही चालू हैं। कुछ सेंटरों से कम्प्यूटर सेट सरकारी दफ्तरों और अधिकारियों के घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं। विजयपुर में तो एक बीआरसीसी ने हेडस्टार्ट के कम्प्यूटर्स से बकायदा निजी तौर पर कम्प्यूटर सेंटर खोलकर व्यापार शुरू कर दिया। इतना ही नहीं जिले से नौ लाख 70 हजार रुपये के कम्प्यूटर चोरी हुए हैं। मुरैना जिले के कुल 79 हेडस्टार्ट सेंटरों में से 40 ही काम करने की स्थिति में हैं। इनमें से भी कुछ बिजली के रहमोकरम पर हैं। यहां भी छह सेंटरों ( जैतपुर, चिन्नौनी, कैलारस कारखाने के पास, कुटोली, नैपरी और कुल्हौली) से चोर कम्प्यूटर ले भागे।
शिवपुरी जिले में हेडस्टार्ट सेंटरों की संख्या 75 है लेकिन इसमें से बमुश्किल बीस ही ढंग से काम कर रहे हैं। शेष विभिन्न कारणों के चलते बंद की स्थिति में हैं। कम्प्यूटरों के वार्षिक रखरखाव का ठेका नहीं होने की वजह से कुछ स्थानों पर छोटी-मोटी गड़बड़ियों के कारण ही कम्प्यूटर बंद पड़े हैं। हेडस्टार्ट सेंटर प्रभारी भी इसके लिए अपनी ओर से कोई पहल नहीं करना चाहते। दतिया जिले में भी 69 में से आधे हेडस्टार्ट सेंटर काम करने की स्थिति में नहीं है। दो सेंटरों से कम्प्यूटर चोरी हो चुके हैं।
ग्वालियर जिले में भी हेडस्टार्ट को लेकर स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं हैं। 66 हेडस्टार्ट सेंटर में से 40 ही चालू हैं। इनमें से भी अधिकांश शहरी क्षेत्र में स्थित हैं। चोरी की घटनाओं से यह जिला भी अछूता नहीं रहा है। कमोवेश गुना व अशोक नगर जिले में भी हेडस्टार्ट कार्यक्रम ऐसे ही संक्रमण काल से गुजर रहा है।
लगते हैं बिजली के झटके
डाइस की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्वालियर-चम्बल के 80 फीसदी से अधिक स्कूलों में बिजली के कनेक्शन नहीं हैं। जिन स्कूलंों में बिजली कनेक्शन के साथ कम्प्यूटर हैं वहां बिजली बिल के भुगतान को लेकर दिक्कतें आ जाती हैं। बिल भुगतान के लिए अलग से कोई मद नहीं है। ऐसी स्थिति में बिल अधिक आने पर स्कूल प्रबंधन बिजली कनेक्शन कटवाना ही उचित समझता है। कहने को राज्य शिक्षा केंद्र ने कई हेडस्टार्ट सेंटरों पर इनवर्टरों के साथ ही समय-समय पर इनकी बैटरी के रिप्लेसमेंट की व्यवस्था की है लेकिन दिक्कत यह है कि अधिकांश ग्रामीण इलाकों में बिजली उपलब्ध ही नहीं हैं।
नहीं हैं सुरक्षा के प्रबंध
एक हेडस्टार्ट सेंटर पर डेढ़ से दो लाख रुपये की सामग्री रहती है लेकिन इस सामग्री की सुरक्षा का विशेष इंतजाम नहीं रहता। विशेषकर आबादी से हटकर बने स्कूलों में कम्प्यूटरों की सुरक्षा शिक्षकों के लिए परशानी का कारण बनती है। यही स्थिति है कि कुछ स्कूलों में तो सुरक्षा के नाम पर पिछले तीन-चार साल से कम्प्यूटर अलमारी के लाक-अप में ही नहीं रखे जा रहे बल्कि कुछ लोगों ने तो करटस की सील तक नहीं खोली है। अधिकांश स्कूलों की स्थिति यह है कि रात के समय चौकीदार या सुरक्षाकर्मी की कोई व्यवस्था नहीं रहती। स्कूलों के पास सुरक्षा के नाम पर कोई फंड भी नहीं होता। ऐसी स्थिति में कम्प्यूटर की सुरक्षा भगवान भरोसे ही रहती है।
क्यों होते हैं कम्प्यूटर चोरी
आखिर हेडस्टार्ट कार्यक्रम के कम्प्यूटर ही चोरी क्यों होते हैं? यह सवाल शिक्षा महकमे में अक्सर ही चर्चा का विषय रहता है। ग्वालियर शहर के व्यस्त इलाके जनकगंज में स्थित हेडस्टार्ट के कम्प्यूटर आसानी से चोरी हो गए जबकि चोरों ने बगल के ही कक्ष में रखे हायर सेकंडरी स्कूल के कम्प्यूटरों को हाथ तक नहीं लगाया। कुछ स्थानों पर तो आडिट आब्जेक्शन के बाद चोरी के मामले दर्ज कराए गए। हालांकि पांच सौ रुपये देकर हेडस्टार्ट सेंटर का बीमा कराया जाता है। इस राशि पर संबंधित स्कूल के प्रबंधन की निगाह रहती है। सूत्रों की मानें तो साहबों को उपकृत करने के लिए चोरी की आड़ ली जाती है।