जयपुर. रेलगाड़ी चल रही हो और पटाखा फूटने की आवाज आए तो समझ लीजिए आगे घना कोहरा है और गाड़ी रुकने वाली है। अंग्रेजों के जमाने की कुछ तरकीबों का रेलवे आज भी कोई विकल्प नहीं निकाल पाया है। इनमें से एक है कोहरे का संकेत देने के लिए पटरियों पर पटाखे फोड़ना।
भारतीय रेल आज भले ही विकसित देशों की बराबरी करने की स्पीड में चल रही हो लेकिन रेलचालकों को आकस्मिक सूचना देने के लिए तो डेढ़ सौ साल पुरानी ‘पटाखा प्रणाली’ काम में ली जा रही है।
यह तरकीब सर्दियों में कोहरे के कारण कम दृश्यता से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के प्रमुख रूप में काम आती है। रेलवे इसके अलावा बेटिकट यात्रियों की धरपकड़ के लिए भी ट्रेन को दो स्टेशनों के बीच सुनसान जगह पर रोकने के लिए यही तरकीब काम में लेता है।
कितनी कारगर है यह तरकीब : आधुनिक तकनीक के जमाने में यह तरकीब अब सवालों के घेरे में है। तेज रफ्तार वाली गाड़ियों को रोकने में यह तरकीब उतनी कारगर नहीं मानी जा रही है, इसलिए अब दूरसंचार तकनीक को अपनाए जाने की योजना चल रही है।
रेलवे में हर वर्ष करीब 16 करोड़ के पटाखों की खरीद की जाती है। इसका उपयोग पूरा नहीं हो पाता। यही वजह है कि तीन-चार साल तक ये डेटोनेटर काम आते रहते हैं। इसलिए इसके बजट को खपाने के लिए भी पटाखों की खरीद को संदेह की नजर से देखा जाता है।
भावी योजना
रेल मंत्रालय ने रेलचालकों को आकस्मिक सूचना देने के लिए ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) लागू करने की योजना बनाई है। उत्तर रेलवे के अम्बाला डिवीजन में इस तकनीक का परीक्षण किया जा रहा है। वैसे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के सहयोग से आधुनिक रेल ट्रैफिक सिस्टम पर भी कानपुर के आसपास परीक्षण चल रहा है। कई जगह रेलवे ने अपने कर्मचारियों को वाकी-टॉकी भी दिए हैं।
क्या है जीपीएस
यह ट्रैफिक सिस्टम सैटेलाइटों से संचालित होता है। सभी ट्रेनों पर लगे एंटीना से रेलचालक अपने बारे में सभी जानकारी कम्प्यूटरों के माध्यम से सैटेलाइट तक पहुंचाते हैं। सैटेलाइट चौबीसों घंटे माइक्रोवेव सिग्नल प्रसारित करते हैं।
इन सिग्नलों को जीपीएस रिसीवर पकड़ता है, जिससे ट्रेन की लोकेशन, गति, दिशा और समय की सही-सही जानकारी मिलती रहती है। जीपीएस की बड़ी कमजोरी यह है कि इसके सिग्नलों के मार्ग में यदि दूसरे रेडियो सिग्नल आ जाएं तो ट्रेन के बारे में दी गई जानकारी में गड़बड़ी आ सकती है।
फिर भी असर नहीं दिखता
रेलवे की नजर में यह तकनीक आज भी कारगर मानी जाती है लेकिन इसके बावजूद सर्दियो में घने कोहरे के कारण ट्रेनें लेट हो रही है। ये पटाखे केवल सिग्नल के संकेतक के रूप में काम में आते हैं लेकिन ट्रैक घने कोहरे में नहीं दिखाई देता, इससे रेलगाड़ियों की गति धीमी रखनी पड़ती है।
पिछले एक सप्ताह में उत्तर पश्चिम रेलवे की 15 से ज्यादा रेलगाड़िया कोहरे के कारण प्रभावित हुईं और निर्धारित समय पर नहीं पहुंचीं। जयपुर में जम्मू तवी और हावड़ा एक्सप्रेस, हरिद्वार अहमदाबाद सहित मरुधर जैसी गाड़िया अमूमन तीन से चार घंटे देरी से पहुंच रही हैं।
गंगानगर व अलवर इलाके अधिक प्रभावित
नहरी पानी वाले श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ व दिल्ली से सटे इलाकों अलवर आदि क्षेत्रों में रात के समय कोहरे के कारण ड्राइवर को सिग्नल दिखाई न देने की स्थिति में ये पटाखे फोड़े जाते हैं।
फिर भी लीक पीटना जारी है
रेलवे के अधिकारी हालांकि यह स्वीकार करते हैं कि देश में जब 130 से 150 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से ट्रेन दौड़ रही हों, तब रेलचालकों को पटाखों से सतर्क करना बेकार है। यह तरकीब तब उपयोगी थी जब ट्रेन की गति करीब 50 किमी प्रतिघंटे थी।
ऐसी ट्रेनों को पटाखों की मदद से रोका जाना संभव था, लेकिन राजधानी व शताब्दी एक्सप्रेस जैसी द्रुतगामी ट्रेनों को पटाखों की आवाज से रोकना संभव नहीं है। फिर भी रेलवे पुरानी परंपरा को जारी रखते हुए आज भी बजट में इसका प्रावधान करता है।
पटाखों का हो चुका है दुरुपयोग
चार साल पहले हिंडौन में श्रीमहावीरजी के पास पटाखों का दुरुपयोग हुआ था। तब कुछ लोगों ने पटरी पर पटाखे रखकर ट्रेन रोक दी थी। घटना के बाद मामले की व्यापक स्तर पर पुलिस जांच हुई थी।
पटाखा फटा तो समझो..
छाया होगा आगे घना कोहरा
आसपास कहीं हादसा हुआ है
आगे खड़े हैं मजिस्ट्रेट साहब
ड्राइवर को किया गया है सावधान
यूं होता है धमाका
आपात स्थिति में रेल कर्मचारी खतरे से 270 मीटर दूर पटरी पर पटाखा (बारूद से भरा डेटोनेटर) लगाता है। ट्रेन के दबाव से पटाखा फटता है और जोरदार धमाका होता है। इसके साथ ही या तो ट्रेन की रफ्तार डैड कर दी जाती है या फिर ब्रेक लगा दिए जाते हैं।
कीमत
एक पटाखा 80 रुपए का।
रखरखाव
एक पैकेट में 10 पटाखे रखे जाते हैं।
किनको दिए जाते हैं
स्टेशन मास्टर, चालक, गार्ड, गैंगमैन, गेट इंचार्ज, पेट्रोलमैन, टावर वैगन चालक, फॉग सिग्नलमैन, मोटरमैन आदि।
कितने मिलते हैं
फॉग सिग्नलमैन को 20 और शेष सभी को दस-दस।
वैधता
पटाखों की वैधता सामान्यत: 7 साल होती है। इसके बाद हर साल टेस्ट के बाद इनकी वैध अवधि 3 साल तक बढ़ाई जा सकती है। नहीं तो इन्हें नष्ट कर दिया जाता है।