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Chhattisgarh
Raipur Raipur भिलाई. नेहरू नगर में स्थापित बायोमेथेनेशन प्लांट पिछले 20 दिन से बंद पड़ा है। और तो और आक्सीडेशन पांड्स में सिवरेज का पानी भी नहीं डाला जा रहा है। यह गंदा और विषैला पानी सीधे कोसा नाला में छोड़ा जा रहा है। करीब आधा करोड़ की लागत से जिस उद्देश्य को लेकर इस प्लांट की स्थापना की गई थी उसका मकसद पूरा नहीं हो रही है।
जला दी जाती है गैस
इस प्लांट में कोई खास तकनीकी खराबी नहीं है। बनाए गए सभी पांड्स ठीक हैं और इनसे कचरे और पानी की बेहतर ढंग से छनाई भी होती है। प्यूरीफाइड सिवरेज वाटर रिएक्टर टंकी में सप्लाई होता है और गैस भी बनती है लेकिन इस गैस को बाहर निकालकर यूं ही जला दिया जाता है। यह न तो कलेक्ट की जाती है और न ही यहां कलेक्ट करने का कोई सिस्टम है।
जबकि बहुत कम खर्च पर यह सिस्टम बनाया जा सकता है। रिक्टर टंकी से मिथेन गैस निकलती है जिसे आसानी से कलेक्ट कर बेचा जा सकता है। टंकी में रोज इतनी गैस बन जाती है कि 10 सेमी व्यास वाली पाइप से दो घंटे तक गैस निकलती है लेकिन पाइप का वाल्व खोलकर इसे जला दिया जाता है। प्रतिदिन जलने वाली इस गैस की अनुमानित कीमत करीब दो हजार है। इस तरह हर माह 60 हजार रुपए की गैस बर्बाद कर दी जाती है।
केवल पांच एचपी की एक मोटर
यहां सिवरेज वाटर खींचने के लिए पांच एचपी की केवल एक मोटर लगाई गई है। यह भी केवल 10-12 घंटे चलाई जाती है। बाकी समय सिवरेज का पानी सीधे नाले में जाता है। जब मोटर चलती है तब भी सिवरेज का पूरा पानी नहीं आता। इस दौरान भी आधा सिवरेज वाटर नाले में जाता है।
पानी इतनी कम मात्रा में खींचा जाता है कि अंतिम आक्सीडेशन पांड तक सिवरेज का प्रोसेस्ड वाटर बहुत कम मात्रा में जाता है और उसे वहीं रोक लिया जाता है। जबकि प्रोसेस्ड वाटर को नाले में छोड़ना चाहिए।
हो सकती है लाखों की कमाई
नगर निगम यदि चाहे तो आक्सीडेशन पांड्स में पर्याप्त सिवरेज वाटर डालकर और उसकी प्रोसेसिंग के बाद प्रतिमाह लाखों रुपए की गैस का उत्पादन कर सकता है लेकिन प्रशासनिक उदासीनता की वजह से निगम को यह घाटा उठाना पड़ रहा है। प्लांट के बंद रहने या कम सिवरेज वाटर खींचने की वजह से शहर का प्रदूषण कम नहीं हो रहा है, सो अलग।
नेहरू नगर पांड्स में सिवरेज वाटर प्रोसेसिंग का कार्य 10 साल से बंद पड़ा था, जिसे शुरू किया गया है। रिएक्टर टंकी से निकलने वाली गैस को कलेक्ट करने जल्द ही सिस्टम तैयार किया जाएगा।