अभिमत. फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की प्रस्तावित भारत यात्रा में उनकी गर्लफ्रैंड कार्ला ब्रूनी का पेंच वास्तव में उलझन भरा है। गणतंत्र दिवस समारोह पर सरकोजी के साथ उनकी हैसियत क्या होगी, यह सोच-सोच कर पेशानी पर बल पड़े हुए हैं। भारत के संदर्भ में इसलिए इसकी महत्ता बढ़ गई है कि आखिर हम समाज में ऐसी महिला को कैसे परिभाषित करेंगे, जो न तो किसी की पत्नी है और न ही किसी की मंगेतर। फ्रांस में तो सरकोजी सरीखे आशिकमिजाज राष्ट्रपतियों के लिए बाकायदा एक परिभाषा गढ़ी जा चुकी है।
ऐसे में भारत सरकार ने गेंद फ्रांस सरकार के पाले में ही डाल दी है। अगर वह उन्हें जीवनसाथी का दर्जा देता है तो सरकार पलक-पांवड़े बिछाकर ब्रूनी का स्वागत करेगी, अन्यथा आधिकारिक समारोहों में उन्हें सरकोजी के साथ शामिल होने का मौका नहीं मिलेगा। इसी उधेड़बुन में लगे भारत सरकार के कारिंदे मन ही मन चाहते हैं कि ब्रूनी भारत नहीं आएं। उनकी फिक्र ब्रूनी की आधिकारिक हैसियत से अधिक परंपरावादी भारतीय खेमों को लेकर है, जो उनके आगमन पर हाय-तौबा मचा सकते हैं। राहुल गांधी के साथ भी ऐसा कुछ हुआ था, जब वे केरल में छुट्टियां मनाने के दौरान अपनी विदेशी गर्लफ्रैंड को ले आए थे। हो-हल्ले के अलावा राहुल के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी।
वैसे कार्ला की सरकोजी के साथ विदेश यात्रा पहली बार विवादास्पद नहीं हुई है। हाल ही में मिस्र में भी उनकी यात्रा को वहां के कुछ सांसदों ने 'आधिकारिक वेश्यावृत्ति' करार दिया था। पोप से मुलाकात के वक्त भी सरकोजी को ब्रूनी को साथ न लाने की हिदायत दी जा चुकी है। चीन ऐसी किसी दुविधा को झेलने से बच गया, क्योंकि पिछले वर्ष नवंबर में सरकोजी अपनी मां के साथ चीन यात्रा पर गए थे। अब भारत सरकार कार्ला ब्रूनी के आगमन पर दुविधा से घिरी नजर आ रही है, जो कहीं न कहीं सांस्कृतिक विभिन्नता से उपजा संशय भी है।