HomeVichaar Vichaar

और न बिगड़ने दें पृथ्वी का थर्मोस्टेट

दृष्टिकोण. जलवायु परिवर्तन की समस्या भारत के सामने अब तक आई किसी भी दूसरी समस्या से ज्यादा भयावह समस्या के रूप में खड़ी है। यदि देश के नीति-निर्माता समय पर नहीं चेते, तो यह समस्या करोड़ों देशवासियों के अस्तित्व के लिए भीषण खतरा बन सकती है। मगर न तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और न ही योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलूवालिया को इस बात का आभास है कि जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर भारत के सामने खड़ी विकट समस्याएं देश की अर्थव्यवस्था के बारे में उनकी सुनहरी परिकल्पनाओं का मखौल उड़ा सकती हैं। इसकी वजह यह है कि मनमोहन और मोंटेक दोनों ही अर्थशास्त्री हैं और ऐसे अर्थशास्त्री बिरले ही होते हैं जो पारिस्थितिकी वास्तविकताओं को समझते हों या फिर उनका सम्मान करते हों।

ऐसे में इस बात पर आश्चर्य नहीं कि जब दुनिया के ज्यादातर देश अपने जंगलों, नदियों और आद्र्र क्षेत्रों का संरक्षण करने में जुटे हैं तब भारत में वन (संरक्षण) कानून, वन्य-पशु (संरक्षण) कानून, पर्यावरण (संरक्षण) कानून और यहां तक कि तटीय क्षेत्र (नियमन) नियमावली के प्रावधानों में ढील दी जा रही है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि उपरोक्त संरक्षण कानूनों के कड़े प्रावधान देश के सीमित प्राकृतिक संसाधनों को नकदी में बदलने में बाधक बन रहे थे। केंद्र सरकार ने इसी मंगलवार को वन अधिकारों की मान्यता संबंधी कानून को अधिसूचित करके वनवासियों से जुड़े विभिन्न संरक्षण कानूनों के अमल में नई पेचीदगियां पैदा कर दी हैं।

ऐसा करके हम बेहद गंभीर चूक कर रहे हैं जिसके लिए आने वाली पीढ़ियां संकीर्ण सोच वाले हमारे राजनेताओं को कभी माफ नहीं करेंगी। करोड़ों भारतीयों के असमय काल का शिकार बनने के लिए इतिहास इन राजनेताओं और इनके तमाम सलाहकारों को ही दोषी ठहराएगा। मुझे यह देखकर निराशा होती है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले पूरे साल में उन करोड़ों किसानों, मछुआरों अथवा शहरी व ग्रामीण गरीबों की समस्याओं की बाबत एक बार भी चिंता नहीं जताई, जो जलवायु परिवर्तन के पहले और सर्वाधिक शिकार होने वाले हैं। नतीजतन, ये भोले-भाले लोग वह जानकारी प्राप्त करने से वंचित रहे जिससे वे अपना और अपनों का जीवन तथा आजीविका के साधन बचा सकते थे। यहां उल्लेखनीय है कि अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, यूरो संघ और दूसरे औद्योगिक देशों के स्कूली बच्चे तक जलवायु परिवर्तन और उसके असर के बारे में जानते हैं तथा अभी से उससे निपटने की तैयरियों में जुट गए हैं।

रोचक है कि 2007 का नोबेल शांति पुरस्कार डॉ. राजेंद्र पचौरी की अध्यक्षता वाली जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति (इंटरगवर्नमेंटल पेनल ऑन क्लाइमेट चेंज-आईपीसीसी) तथा अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर की लीक से हटकर बनाई गई फिल्म 'एन अनकन्वेएंट ट्रुथ' के लिए दिया गया। आम तौर पर नोबेल शांति पुरस्कार उन लोगों को दिया जाता है जो दुनिया में खूनखराबा रोकने की दिशा में काम करते हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाले पर्यावरणविदों को यह पुरस्कार दिया जाना यह इंगित करता है कि इस समस्या का सामना करने के लिए युद्ध-स्तरीय तैयारी की जरूरत है। आखिर जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, बाढ़, महामारी और कृषि उपज में कमी से जिस बड़े पैमाने पर मौतें होने का अंदेशा है उतनी मौतें तो पृथ्वी पर अब तक हुए किसी भी युद्ध में नहीं हरुइ। इसी बीच देश में कई गैर सरकारी संगठन विभिन्न पर्यावरण समूहों के साथ मिलकर वर्कशाप व सभाओं का आयोजन करके तथा अन्य प्रचार माध्यमों के जरिये लोगों को जलवायु परिवर्तन के खतरों के बारे में आगाह करने में जुटे हैं। वे लोगों को बता रहे हैं कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का थर्मोस्टेट बिगड़ गया है तथा पृथ्वी के ऊपर ग्रीनहाउस गैसों के कुल भंडार में 20 फीसदी जंगलों की कटाई की वजह से जमा हुआ है।

दूसरे शब्दों में, हम जितनी भी नर्मदा घाटियों या नियमगिरियों की बलि देंगे, जलवायु परिवर्तन का खतरा उतना बढ़ता जाएगा। इसका मतलब यह भी है कि कान्हा, बांधवगढ़, रणथंभौर, गिर, पेरियार, काजीरंगा सरीखे अभयारण्यों का संरक्षण करने वाले लोगों ने वन्य-प्राणियों की विलुप्त होती प्रजातियों को बचाने के साथ-साथ कार्बन-डाइ-आक्साइड जैसी नुकसानदेह गैस को वातावरण में जाने से रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हाल में संपन्न बाली सम्मेलन में भारत जैसे ऊष्ण-कटिबंधीय देशों को कार्बन संरक्षण के लिए आर्थिक मदद देने की पेशकश करके दुनिया ने जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने के एक सबसे अच्छे उपाय के रूप में मान्यता दी है। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसकी वजह से समुद्र का स्तर बढ़ने से तटीय इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोग पहले तो अपने जल स्रोतों के क्षारीय हो जाने की समस्या झेलने को मजबूर होंगे और फिर उनके खेतों और घरों को भी समुद्र लील जाएगा। इसी दौरान हिमालय के ग्लेशियर प्रतिवर्ष 30 मीटर की दर से घटने लगेंगे जिससे उत्तर भारत के राज्यों में खेती के लिए पानी का संकट पैदा हो जाएगा। आने वाले वर्षो में जलवायु में केवल इन दो बदलावों से करीब पांच करोड़ भारतीय प्रभावित होंगे। इनमें से अधिसंख्य पर्यावरण शरणार्थी के रूप में शहरों की ओर पलायन करेंगे।

नतीजतन, कानून और व्यवस्था की समस्या तो खड़ी होगी ही, अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित होगी। इस सबके बावजूद हमारे नेता घाटियों, नदियों, जंगलों, झीलों, चरागाहों जैसी अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों, जो हमें जलवायु परिवर्तन से बचाने की क्षमता रखते हैं, की बलि देकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ाने के सपने देखने में लगे हैं। ऐसा भी नहीं है कि देश जिस आत्मघाती रास्ते की ओर बढ़ रहा है उसके विकल्प हमारे पास नहीं हैं। हमारे दीर्घकालिक हित सकल घरेलू उत्पाद या शेयर बाजार के सूचकांकों को पैमाना बनाने से नहीं सधेंगे। इसके लिए हमें अच्छी पारिस्थितिकी को अपने राष्ट्रीय विकास का दिशासूचक बनाना होगा। ऐसा करके ही हम स्वास्थ्य, समानता, आत्म-निर्भरता और राष्ट्रीय गौरव के तमाम अधूरे लक्ष्यों को हासिल कर सकेंगे।
-लेखक प्रख्यात पर्यावरणविद हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: