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Shekhawati Shekhawati श्रीमाधोपुर. आसमान में पतंगों के पेच लड़ाने का पर्व मकर संक्रांति अब करीब है। इस पर्व पर पतंग उड़ाने का रिवाज होने के कारण बाजारों में बड़ी तादाद में पतंगो की बिक्री होती है। इसे लेकर कस्बे सहित आसपास के गांवों में पतंगों की दुकानें सजने लगी गई हैं।
बरेली की बनी मच्छी, तारा एवं डीलक्स कागज की पतंगे जहां नाम से अच्छे दामों में बिकती हैं, वहीं जयपुर में बनी चांद, तिलक, तिरंगा छाप स्पेशल पतंगें बच्चे एवं चाव से उड़ाते हैं।
पतंग विक्रेता गोकुल शर्मा के अनुसार दिल्ली एवं बरेली डोर का चलन पुराना है तथा यहां बनी डोर पुराने पतंगबाज चेन अथवा गनमार्का देखकर ही पतंग उड़ाते हैं, जबकि आजकल वर्धमान धागे पर बनी वाहिद राजा नाम से बना मांझा खूब बिकता है। इसके अलावा रियासत, टीपू सुल्तान, एनआरके की डोर की भी बिक्री अच्छी होती है।
घटता रूझान कम होती बिक्री
श्रीमाधोपुर. करीब पांच वर्ष पूर्व कस्बे में मकर संक्रांति के एक तथा दो महीने पहले ही पतंगबाजी शुरू हो जाती थी। युवाओ में उन दिनों पतंगबाजी को लेकर उत्साह देखते ही बनता था।
कस्बे के मशहूर पतंगबाज पोथी पंजाबी, पप्पू सांखला, हरीश कुमावत ने बताया कि १९९२ से २क्क्२ तक वे करीब हर वर्ष 12 चरखी डोर की मकर संक्रांति से पूर्व ही पूरी कर देते थे, लेकिन अब बढ़ती महंगाई के कारण इस त्योहार पर पतंग उड़ाने का रुझान कम होता जा रहा है। पतंग विक्रेता महावीर कुमावत ने बताया कि अभी थोक की बिक्री ही शुरू हुई है। आजकल मकर संक्रांति के एक दो दिन पूर्व ही खुदरा ब्रिकी परवान पर होती है।