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Shekhawati Shekhawati सीकर.
नए परिसीमन का असर सीकर जिले में भी होगा। दो क्षेत्रों में तब्दीली ओर अन्य क्षेत्रों में गांवों की घटत-बढ़त से पहले से जमे राजनीतिक समीकरणों में बदलाव संभावित है। स्थापित राजनेताओं की जड़ें हिल गई हैं, तो कई बेघर होने की कगार पर है। ऐसे में यह मसला इन दिनों राजनीतिक हलकों में खासा चर्चा का विषय बना हुआ है। परिसीमन के बाद भास्कर ने शेखावाटी की प्रत्येक विधानसभा सीट की पड़ताल की है। आज शुरुआत सीकर से।
परिसीमन की नई रिपोर्ट के बाद राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। हालांकि सीकर जिले की आठ विधानसभा क्षेत्रों में से मात्र दो में ही बदलाव किया गया है, लेकिन आंशिक संशोधन के कारण प्रभावित सभी क्षेत्र हुए हैं। इसी के साथ अब तक इन क्षेत्रों में अपनी जड़े जमा चुके कुछ राजनेताओं के सामने भी संकट खड़ा हो सकता है।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि अब इन राजनेताओं को नई जमीन तलाशनी पड़ सकती है। यह तय है कि धोद में स्थापित कामरेड अमराराम को अब नए सिरे से घर तलाशना ही होगा। इसके अलावा लक्ष्मणगढ़ में केडी बाबर के साथ ही ऐसी ही स्थिति है। इतना ही नहीं कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष परसराम मोरदिया के लिए भी संकट खड़ा हो गया है। उन्हें भी नया क्षेत्र तलाशना होगा।
कभी कांग्रेस का गढ़ रहा धोद क्षेत्र पिछले कुछ वर्षो से माकपा की मल्कियत बनी थी, लेकिन नए परिसीमन के बाद अब फिर से स्थिति बदल गई है। आरक्षित होने के कारण अमराराम के रूप में व्यक्ति विशेष को मिलने वाला लाभ अब नहीं मिल पाएगा। यहां से नए उम्मीदवारों मैदान में आ सकते हैं।
धोद पर कभी महरिया परिवार का भी दबदबा कायम रहा था, लेकिन उनके लिए भी अब स्थिति बदल गई है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी रामदेवसिंह महरिया ने धोद से निर्दलीय चुनाव लड़ा था। लक्ष्मणगढ़ से इस बार भाजपा के बैनर तले केडी बाबर विजयी रहे। लक्ष्मणगढ़ सीट सामान्य होने से अब उन्हें भी नए क्षेत्र में जाना होगा।
अब चूंकि परिसीमन रिपोर्ट लागू होने वाली है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों में इसे लेकर संशय बना हुआ है। अन्य विधानसभा क्षेत्रों में नए गांवों के जुड़ने वर्तमान विधायकों के सामने भी अजीब सी स्थिति पैदा हो गई है। विधानसभा चुनावों में अब मात्र करीब 10 महीने ही शेष रहे हैं।
ऐसे में इन प्रतिनिधियों को नए क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम करने में खासी मशक्कत का सामना करना पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार धोद विधानसभा क्षेत्र में चार गांव हटाकर 15 नए गांव जोड़े गए हैं। सीकर में 15 गांव हटाकर चार जोड़े गए हैं। खंडेला में 16 गांव हटाकर 16 ही नए गांव जोड़े गए हैं। नीमकाथाना में 30 हटाकर 16 तथा श्रीमाधोपुर में16 गांव छोड़कर 30 नए गांव जोड़े गए हैं।
नए गांवों में देनी होगी दस्तक
नए परिसीमन का असर सीकर विधानसभा पर भी पड़ सकता है। सीकर विधानसभा क्षेत्र की चर्चा करें, तो एक बात स्पष्ट है कि यह सीट परंपरागत रूप से कांग्रेस की धरोहर रही है। 1952 से लेकर अब तक अधिकांशत: इस सीट पर कांग्रेस का ही कब्जा रहा है। इस क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या निर्णायक होने के कारण हमेशा कांग्रेस को इसका फायदा मिला है।
1977 में आई जनता लहर में भी यहां पर कांग्रेस ने अपना वर्चस्व बरकरार रखा तथा ग्रामीण पृष्ठभूमि के रणमलसिंह ने जीत दर्ज की थी। हालांकि इसके बाद भाजपा के घनश्याम तिवाड़ी ने दो बार यहां से जीत दर्ज कर कांग्रेस की चूलें हिलाई, लेकिन उनकी तिगड़ी नहीं बन पाई और 1990 में राजनीति में बिल्कुल नए खिलाड़ी राजेन्द्र पारीक ने उनको जिला बदर ही कर दिया। पारीक 1990 से लगातार जीतते आ रहे, लेकिन पिछले चुनाव में कांग्रेस की आपसी अंतरकलह और पार्टी कार्यकर्ताओं के विद्रोह ने पारीक की राह में बाधा डाल दी थी।
ऐसे में नया चेहरा राजकुमारी शर्मा के रूप में सामने आया और जीत भी हासिल की। परिसीमन के बाद अब वर्तमान विधायक राजकुमारी शर्मा को भी खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है। उनके क्षेत्र के जाने पहचाने गांवों को हटाकर धोद विधानसभा के गांव जोड़े गए हैं। ऐसे में अब तक सीकर विधानसभा तक ही सीमित रही विधायक शर्मा को इन नए क्षेत्रों में पहचान बनानी होगी। कमोबेश ऐसी ही स्थिति का सामना कांग्रेस को करना होगा।