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जिंदगी के बाद मौत भी सेना को समर्पित

चंडीगढ़ब्रिगेडियर (रि.) वाईपी बक्शी ने देश की हिफाजत के लिए सरहद पर दुश्मनों की गोलियों का सामना किया। जिंदगी का बड़ा हिस्सा देश की हिफाजत और सेवा को समर्पित कर दिया। रिटायर होने के बाद भी देशभक्ति की भावना का जज्बा कम नहीं हुआ, लेकिन अफसोस 4 जनवरी को कुछ हमलावरों ने मेरठ में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। मरने से कुछ लम्हे पहले उनकी बेटी के एक फैसले से सेना के ही एक जवान को नई जिंदगी मिल गई है। उनके सभी अंग प्रत्यारोपण के लिए दान कर दिए गए।

बक्शी रिटायरमेंट के बाद मेरठ के शास्त्री नगर में रहते थे। 4 जनवरी को उनके सिर में किसी ने गोली मार दी। उनकी बेटी कामिनी मेहता और पत्नी मेजर जनरल पीके मेहता उन्हें तुरंत सेना के आरआर अस्पताल दिल्ली ले गई। अस्पताल अथॉरिटी ने ब्रिगेडियर को ब्रेन डेड घोषित कर दिया।

कामिनी और मेहता ने हॉस्पिटल कमांडेंट मेजर जनरल ओपी मेथ्यू को ब्रिगेडियर के महत्वपूर्ण ऑर्गन डोनेट करने के लिए शरीर की मांग रखी। कामिनी ने दलील दी कि ताउम्र उनके पिता ने फौज की सेवा की है। अगर मौत के बाद उनके अंगों से किसी की जान बच सके तो यह पिता को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

कमांडेंट ने सफदरजंग अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेट डॉ जगदीश प्रसाद और सेना की सर्जन की मदद से उनकी किडनी 14 साल से सिरोसिस से ग्रस्त एक जवान को ट्रांसप्लांट कर दी। दूसरी किडनी एआईआईएमएस को ट्रांसप्लांटेशन के लिए दे दी गई। ब्रिगेडियर का एक कोर्निया और हार्ट वाल्व भी जरूरतमंद के लिए बैंक में स्टोर कर लिया गया।

पुलिस ने भी दिया सहयोग

ब्रिगेडियर बक्शी की हत्या होने के कारण यह पुलिस केस था। सेना ने पुलिस को इसकी सूचना दी, लेकिन साथ ही कामिनी की इच्छा की पुलिस को बता दी। पुलिस ने अपनी कार्रवाई टाल कर बॉडी पार्ट डोनेशन की मेडिकल कार्रवाई पूरी होने दी।

5/1 जीआर के थे ब्रिगेडियर बक्शी

बख्शी पहली गोरखा राइफल्स की पांचवीं बटालियन में कमीशन हुए थे। उन्होंने बतौर कर्नल 5 वीं गोरखा बटालियन और 4 गोरखा बटालियन को कमान किया। भारत-पाक और चीन युद्ध भी उन्होंने लड़े।





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