2008 में भारत.
स्वतंत्रता आंदोलन के समय कांग्रेस में सभी तरह की विचारधारा के लोग थे। यही कारण था कि महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कांग्रेस को लोक सेवक संघ में बदलने की बात कही थी। हालांकि गांधीजी के निधन के बाद कांग्रेस को चलाने वालों ने मूल पार्टी को बनाए रखा। उस दौरान कांग्रेस के भीतर बड़े कद के अनेक नेता थे, लेकिन नेहरू के देहांत के बाद कांग्रेस में क्षेत्रीय नेताओं को दरकिनार करने का सिलसिला शुरू हुआ।
आंतरिक टकराव बढ़ने के फलस्वरूप कांग्रेस का विभाजन हो गया और देश की विविधता को व्यक्त करने वाला उसका स्वरूप कमजोर पड़ गया। निजिलिंगप्पा, कामराज, अतुल्य घोष, एसके पाटिल, मोरारजी देसाई आदि अपने-अपने क्षेत्र की बड़ी शख्यिसत थे और अच्छा प्रभाव रखते थे, लेकिन ये सब कांग्रेस से अलग हो गए।
आगे चल कर कांग्रेस में दिल्ली हाईकमान का वर्चस्व और परिवारवाद बढ़ा तो इस तरह के नेताओं के लिए पार्टी में गुंजाइश ही नहीं रही। कांग्रेस से इन नेताओं के अलग होने की प्रक्रिया ने ही देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के लिए रास्ता बनाया। सूबों के स्वाभाविक नेता इंदिरा गांधी के नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह करते हुए कांग्रेस से अलग हो गए। चाहे वे चौधरी चरण सिंह रहे हों या बीजू पटनायक।
देश की राजनीति में हुए इस बदलाव में अच्छाई-बुराई दोनों हैं। मैं इंदिरा गांधी के समय से लोकसभा में हूं। मैंने देखा है कि दिल्ली में जब भी साझा सरकारें बनी, जनता के हक में अधिक कदम उठाए गए हैं। चाहे वह संविद सरकार का समय हो या 1989 की साझा सरकार, संयुक्त मोर्चे की सरकार रही हो या राजग की। आज भी देखें तो यूपीए की गठबंधन सरकार को जनहित में बड़े फैसले लेने पड़े हैं।
बैंकों का राष्ट्रीयकरण, पिछड़ों को आरक्षण, गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को सब्सिडी या फिर रोजगार गारंटी योजना जैसे फैसले गठबंधन सरकारों के ही फैसले हैं। इसके विपरीत एक दलीय मजबूत सरकारें आम जनता की अवहेलना करती हैं।
जहां तक साझा सरकारों या गठबंधन की राजनीति का भविष्य है तो यह प्रक्रिया आगे अनेक वर्र्षो तक चलने वाली है। अगली लोकसभा में भी साझा सरकार ही बनेगी। चुनावी मुद्दे भी गरीबी और बेरोजगारी होंगे। वर्तमान में मोटे तौर पर दो मोर्चे हैं -राजग और यूपीए। यूएनपीए को भी इनमें से एक मोर्चे का पक्ष लेना होगा, अन्यथा वह बिखर जाएगा। फिलहाल इस स्थिति में बदलाव होना कठिन है। सभी दल अपने-अपने हिसाब से दोनों में से एक मोर्चे के साथ हैं।
आगे की राजनीति बड़े घटक दल की स्टेट्समैनशिप पर निर्भर करेगी। गठबंधन की सरकारों को मजबूरी का नाम देना सही नहीं है। यह तो आज की राजनीति और लोकतंत्र की अपनी तरह की बाध्यता है। गठबंधनों में खंडन-विखंडन स्वभाविक है। गठबंधन की चुनौतियों के समाधान बड़े दल के राजनीतिक कौशल पर निर्भर है। देश की जनता अंतिम अदालत है और अगर वह बिखरा हुआ जनादेश देती है तो उसका आदर तो करना ही पड़ेगा अन्यथा लोकतंत्र कैसे चलेगा?
लेकिन मैं देखता हूं कि राष्ट्रीय दलों में आंतरिक लोकतंत्र की समाप्ति के खिलाफ विद्रोह करके बने क्षेत्रीय दल भी एक परिवार के दल बनते जा रहे हैं। अपने यहां उन्होंने आंतरिक लोकतंत्र खत्म कर दिया है। आप देश के किसी भी राज्य की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी पर नजर डालें, सब जगह यही स्थिति है।
इस बीमारी के कारण क्षेत्रीय पार्टियां अपने क्षेत्र की आकांक्षाओं का केंद्र बनने के बजाए परिवार की आकांक्षाओं का केंद्र बनती जा रही है। इसके कारण प्रतिभाओं का दमन हो रहा है। जाहिर है ये दल भी विभाजन के रास्ते पर तेजी से बढ़ेंगे। देश की राजनीति इस बीमारी से कब निजात पाएगी यह यक्ष प्रश्न है। यही आने वाले साल और भविष्य की चुनौती भी है।