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Chhattisgarh
Raipur Raipur दुर्ग. जान जोखिम में डालकर कल कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर शासन गंभीर नहीं है। औद्योगिक दुर्घटनाओं में बढ़ती मौत के आंकड़े, मुआवजे के लिए मृतक श्रमिकों के आश्रितों का भटकना एवं बीएसपी समेत जिले के 654 छोटे बड़े कारखानों में सुरक्षा सुनिश्चित कराने के लिए केवल एक अधिकारी की नियुक्ति इसका सबूत है।
पिछले दो साल (2006 व 2007) में जिले में 822 औद्योगिक दुर्घटनाएं दर्ज की गई है। जिसमें 28 श्रमिकों की जान चली गई व 20 श्रमिक गंभीर दुर्घटना के शिकार होकर अपाहिज हो गए। दुर्घटना 2006 के मुकाबले 2007 में बढ़ी है। इसके बाद भी कारखानों में दुर्घटना रोकने के उपायों पर ध्यान नहीं दिया गया।
किसकी जिम्मेदारी
कारखाना अधिनियम के तहत औद्योगिक संस्थानों में दुर्घटना रोकने के उपायों व श्रमिकों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग का काम है। जिले में इस विभाग में एक मात्र डिप्टी डायरेक्टर पदस्थ हैं। जबकि जिले में भिलाई इस्पात संयंत्र समेत 654 छोटे-बड़े कारखाने हैं। जहां हजारों श्रमिक काम करते हैं।
इतने औद्योगिक संस्थानों में कारखाना अधिनियम का पालन हो रहा है या उल्लंघन, यह देखना एक अधिकारी के बूते की बात नहीं है। यही वजह है कि औद्योगिक दुर्घटनाओं में इजाफा हो रहा है।
पद खाली है
औद्योगिक स्वास्थ्य व सुरक्षा कार्यालय दुर्ग में डायरेक्टर का पद लंबे समय से रिक्त है। चार असिस्टेंट डायरेक्टर के पद स्वीकृत हैं, लेकिन सभी पद खाली हैं। अब एक मात्र अधिकारी से दुर्घटनाएं रोकने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
क्या है अधिकारी के कार्य
ठ्ठ कारखानों में कारखाना अधिनियम का पालन सुनिश्चित कराना ठ्ठ उल्लंघन करने पर कार्रवाई कर श्रम न्यायालय में प्रकरण दायर करना ठ्ठ दुर्घटना में मृत श्रमिकों के आश्रितों को मुआवजा दिलवाना ठ्ठ घायल श्रमिकों को उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधा पर नजर रखना ठ्ठ मृत श्रमिकों के आश्रितों को मुआवजा के लिए दावा करने सलाह देना ठ्ठ श्रम न्यायालय में प्रकरण दायर करना।
नए कारखाने खुल रहे हैं। इन्हीं नई यूनिटों में कंस्ट्रक्शन के दौरान ज्यादातर दुर्घटनाएं हुई हैं। श्रमिकों को मुआवजा दिलवाने लेबर कोर्ट में केश दायर किए जा रहे हैं। पिछले महीने बीएसपी में हुई दुर्घटना पर त्वरित कार्रवाई की गई। मुआवजा राशि भी जमा की गई है, लेबर कोर्ट में केश दायर किया जा रहा है।
—रज्जू कुमार भोई, डिप्टी डायरेक्टर, औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा, दुर्ग