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मृत्युदंड के अभियुक्तों की सुनवाई चार हफ्ते बाद

बिलासपुर.court छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस एलसी भादू एवं जस्टिस सुनील सिन्हा ने हत्या एवं सामूहिक बलात्कार के मामले में मृत्युदंड से दंडित 4 अभियुक्तों रामनरेश केंवट, विश्वनाथ सिंह, अमर सिंह एवं रणजीत केंवट की अपील पर सुनवाई के लिए उन्हें नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने सोमवार को प्रकरण के विषय में सुनवाई के लिए 4 हफ्ते बाद की तिथि निर्धारित करते हुए सरकारी वकील को तैयारी करके आने का आदेश दिया है।

गौरतलब है कि अभियुक्तों को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, पेंड्रारोड पीके सिंह ने मृत्युदंड की सजा सुनाई, जिसकी पुष्टि के लिए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रामकुमार तिवारी ने मामले का मूल अभिलेख हाईकोर्ट को प्रस्तुत किया। घटना के अनुसार अभियुक्तों ने 9 अगस्त की सुबह 4 बजे गुल्लीडांड में राजकुमारी के घर घुसकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया तथा हत्या कर दी।

वारदात के वक्त राजकुमारी बच्चों के साथ घर पर अकेली थी तथा उसका पति इंद्रजीत ससुराल राजनगर गया हुआ था। आधी रात के वक्त घर के बरामदे में नौकर धनीराम टीवी देख रहा था और राजकुमारी अंदर कमरे में सो रही थी। इसी बीच अभियुक्तगण रंजीत, विश्वनाथ, अमर सिंह एवं रामनरेश ने घर घुसकर धनीराम को धमकाया कि वे लोग राजकुमारी के साथ अनाचार करना चाहते हैं, उसने बीच में कुछ बोला, तो जान से मार देंगे।

अभियोजन के मुताबिक रामनरेश एवं अमर सिंह धनीराम के पास बैठे और रंजीत तथा विश्वनाथ ने राजकुमारी के कमरे में जाकर उसके साथ बलात्कार किया। इसके बाद रंजीत एवं विश्वनाथ आकर धनीराम को आंगन में ले गए और रामनरेश व अमरसिंह राजकुमारी के कमरे में घुसे तथा थोड़ी देर बाद बाहर निकले। वारदात के बाद धनीराम जब कमरे के अंदर गया, तो उसने देखा कि राजकुमारी के नाक-मुंह से खून बह रहा था और सांस जोर- जोर से चल रही थी।

धनीराम ने इसकी सूचना सुगरी बाई को दी, मौके पर जाने पर राजकुमारी मृत पाई गई। प्रकरण की सूचना मिलने पर इंद्रजीत ने अभियुक्तों के खिलाफ रिपोर्ट की, जिस पर पुलिस ने उनके खिलाफ धारा 449, 376, 302-34 के तहत जुर्म दर्ज कर न्यायालय में चालान पेश किया। मृत्युदंड की सजा के खिलाफ इस मामले में विश्वनाथ की ओर से वकील अरुण कोचर तथा अन्य अभियुक्तों की ओर से उक्त निर्णय के विरुद्ध हाईकोर्ट में दांडिक अपील की गई।

अभियुक्तों की ओर से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के परीक्षण में उन्होंने स्वयं को निदरेष बताया है। उनका कहना है कि वे इंद्रजीत के यहां नहीं गए थे और न ही अपराध किया है। घटना के समय वे अपने घर पर थे। उन्हें चश्मदीद धनीराम ने झूठा फंसाया है। अभियुक्तों द्वारा प्रतिरक्षा में दो गवाहों कमला व समयलाल का परीक्षण कराया।

जाति मामले में दो सप्ताह में निर्णय का आदेश

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस सतीश अगिहोत्री की एकलपीठ ने सहायक संपरीक्षक आशीष रामटेके की याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति को श्री रामटेके की जाति के प्रमाण पत्र के सत्यापन प्रकरण में दो सप्ताह में निर्णय लेने का आदेश दिया है। प्रकरण के अनुसार आशीष रामटेके स्थानीय निधि संपरीक्षा विभाग में सहायक संपरीक्षक के पद पर चयनित हुए।

चयन के बाद महकमे ने उनकी जाति के प्रमाण पत्र को राज्य स्तरीय छानबीन समिति, रायपुर से सक्षम अधिकारी द्वारा जारी प्रमाण पत्र को सत्यापित करवाने के लिए आदेशित किया गया। श्री रामटेके ने समिति के समक्ष 4 अगस्त 2007 को प्रमाण पत्र सहित दस्तावेज निर्धारित प्रारूप में प्रस्तुत किया। छानबीन समिति ने 10 अगस्त 1950 के पूर्व श्री रामटेके के पूर्वजों के भूमि संबंधी प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की मांग की। भूमि संबंधी रिकार्ड प्रस्तुत नहीं करने पर उनका प्रमाण पत्र सत्यापित नहीं किया गया।

श्री रामटेके ने इसके खिलाफ वकील अनूप मजुमदार के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर माधुरी पाटील विरुद्ध राज्य शासन के न्याय दृष्टांत के आधार पर बताया कि हाईकोर्ट ने प्रकरण में आदेश दिया कि प्रार्थी को अपना डोमीसाइल स्टेटस साबित करने के लिए 1950 के पहले के भूमि संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील के तर्को से सहमत होते हुए समिति को इस मामले में दो सप्ताह में फैसला करने का आदेश दिया।
यूनिवर्सिटी के खिलाफ प्रस्तुत याचिका निराकृत

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा ने एमबीबीएस अंतिम की छात्रा रेशमा जाना द्वारा गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी के खिलाफ प्रस्तुत याचिका निराकृत करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए सोमवार को यूनिवर्सिटी को जवाब प्रस्तुत करने का आदेश दिया, जिस पर उन्होंेने याचिकाकर्ता का प्रेक्टिकल एग्जाम कराने तथा नतीजे के बाद अंतिम वर्ष की परीक्षा आयोजित करने की जानकारी दी। यूनिवर्सिटी ने 10 जनवरी को आयोजित परीक्षा स्थगित कर दी है।

प्रकरण के अनुसार एमबीबीएस अंतिम वर्ष की छात्रा रेशमा जाना ने भाग-2 की 10 जनवरी को आयोजित परीक्षा में बैठने के लिए सिम्स से अनुमति मांगी थी। छात्रा तीसरे वर्ष की जनवरी 2007 में आयोजित परीक्षा में शामिल हुई थी। उसे ईएनटी कम्युनिटी मेडिसिन में पूरक की पात्रता प्राप्त हुई थी। इसकी लिखित परीक्षा में वह शामिल हुई, परंतु उसकी प्रेक्टिकल परीक्षा नहीं ली गई।

कारण बताया गया कि यूनिवर्सिटी के पास फंड नहीं होने के कारण प्रेक्टिकल एग्जाम नहीं लिए जा सकते। याचिकाकर्ता ने सिम्स से अनुमति मांगी की उसे जूनियर छात्रों के साथ अक्टूबर 2007 में होने वाले प्रेक्टिकल एग्जाम में बैठने की अनुमति दी जाए। इस पर छात्रा को अनुमति तो दे दी गई, परंतु फंड नहीं होने के कारण उसके एग्जाम नहीं लिए जा सके। याचिकाकर्ता ने पुन: सिम्स को आवेदन किया, सिम्स ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह यूनिवर्सिटी का मामला है।

आवेदन पर उचित कार्यवाही नहीं होने पर रेशमा जाना ने वकील कनक तिवारी एवं जितेंद्र पाली के जरिए यूनिवर्सिटी के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका प्रस्तुत की। सोमवार को प्रकरण की सुनवाई के दौरान यूनिवर्सिटी द्वारा याचिकाकर्ता के पक्ष में समाधानकारक जवाब प्रस्तुत करने पर हाईकोर्ट ने याचिका निराकृत करने का आदेश दिया। यदि किसी स्कूल में पिछले साल नौवीं कक्षा में सौ छात्र-छात्राएं अध्ययनरत थे, तो इस साल दसवीं में सवा सौ से करीब छात्र-छात्राओं को एडमिशन दिया जा सकता है। कभी-कभी फेल्योर व श्रेणी-सुधार की वजह से इसमें आंशिक वृद्घि हो जाती है।





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