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साइकिल है या पहिया गाड़ी!

ग्वालियर. अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति की बालिकाओं के लिए आईं साइकिलें कहीं स्कूल भवनों में धूल खा रही हैं, तो कहीं नेताओं के दबाव में अपात्रों के हवाले कर दी गई हैं। टारगेट के फेर में फंसे अफसरों को साइकिलों की गुणवत्ता की भी चिंता नहीं है। बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए नेशनल प्रोग्राम फार एजुकेशन आफ गल्र्स एट एलीमेंटरी लेवल (एनपीईजीईएल) प्रदेश के कुल 313 विकासखंडों में से 280 विकासखंडों में लागू है।

अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति की कक्षा छह में प्रवेश लेने वाली बालिका को सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) फंड से तथा कक्षा नवमी में प्रवेश लेने वाली बालिका को राज्य शासन की ओर से साइकिल उपलब्ध कराई जा रही है। इसमें शर्त यह है कि साइकिल ऐसी बालिकाओं को ही प्रदान की जाएंगी, जिनके घर से स्कूल की दूरी कम से कम तीन किलोमीटर हो।

राज्य शिक्षा केंद्र ने जिला शिक्षा केंद्र के माध्यम से सभी विकासखंडों से पात्र बालिकाओं की जानकारी चाही थी। सक्षम अधिकारियों ने बिना किसी भौतिक सत्यापन और नियमों का ख्याल रखते हुए जानकारी भेज दी। मसलन, शिवपुरी के खनियाधानां ब्लाक में 632 बालिकाओं की जानकारी भेजी गई थी लेकिन जब ब्लाक जेंडर कोआर्डिनेटर ने सत्यापन किया, तो मात्र 325 साइकिलें हीं बट सकीं। कमोवेश अंचल के अन्य जिलों व विकासखंडों में भी यही स्थिति पाई गई है।

सूत्रों की मानें तो एक-एक बालिका का भौतिक सत्यापन करने पर बड़ी गड़बड़ी सामने आ सकती है। प्रदेशभर में कक्षा छह में प्रवेश लेने वाली अजा-जजा की 121409 छात्राओं को साइकिलें देने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन 25 दिसंबर 07 तक केवल 83480 साइकिलें प्राप्त हुइर्ं। ग्वालियर, श्योपुर, भिंड, गुना, अशोक नगर व दतिया समेत कई जिलों में एक भी साइकिल वितरित नहीं हुई। डीपीसी ने बताया कि जिलों में साइकिल सामग्री तो प्राप्त हुई है लेकिन प्रदायकर्ता साइकिल तैयार किए बिना सामग्री छोड़कर चले गए। प्राप्त साइकिलों में 20302 साइकिलों की गुणवत्ता अच्छी नहीं थी।

इसी प्रकार कक्षा नौ की छात्राओं के लिए निर्धारित लक्ष्य 1,15,000 के विपरीत 92359 साइकिलें प्राप्त हुईं। इनमें से 25 हजार से अधिक साइकिलें गुणवत्ताविहीन थीं। संबंधित अधिकारियों का कहना था कि पहले चरण में प्राप्त साइकिलों की गुणवत्ता थोड़ी संतोषजनक थी लेकिन दूसर चरण में प्राप्त साइकिलों का वजन लगभग 14 किग्रा था, जो साइकिल सामग्री की कमजोर क्वालिटी की पुष्टि करता है। अंचल में नि:शुल्क साइकिल प्राप्त करने वाली छात्राओं से चर्चा की गई, तो मालूम हुआ कि साइकिल फ्रेम ही कमजोर नहीं है बल्कि सामग्री भी घटिया है। यह साइकिलें एक शिक्षा सत्र भी काटने की स्थिति में नहीं है।

इसकी वजह यह रही कि कहीं साइकिल सामग्री, तो कहीं कसी हुई साइकिलें स्कूल भवनों में ठसाठस करके भर दी गइर्ं। सूत्रों की मानें तो प्रति साइकिल कक्षा छह के लिए 1850 रुपये व कक्षा नौ के लिए 2100 रुपये खर्च किए गए हैं और यह खरीदी मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम के मार्फत की गई है, जबकि सामग्री के लिहाज से साइकिल की कीमत बमुश्किल 800 से 1000 रुपये होगी।

अफसरों की रूचि नहीं
साइकिलें प्रदेश सरकार के स्तर पर क्रय की गई हैं और उनके वितरण की जिम्मेदारी जिला परियोजना समन्वयक (डीपीसी) और ब्लाक रिसोर्स सेंटर कोआर्डिनेटर को सौंपी गई थी, किंतु उन्होंने इसमें रुचि नहीं ली। जिला व ब्लाक स्तर पर साइकिल सामग्री से लदे ट्रक तीन से चार दिन तक खड़े रहे। ऐसा स्थान उपलब्ध न कराने तथा सुपुर्दगी लेने में आनाकानी करने की वजह से हुआ। चूंकि गलती विभागीय थी इस कारण सरकार को लाखों रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार उठाना पड़ा। राज्य शिक्षा केंद्र के स्पष्ट आदेश थे कि जितनी जरूरत हो, उतनी ही साइकिलों की सुपुदरुगी ली जाए। लेकिन अफसरों ने जरूरत से अधिक साइकिलें उतरवा लीं।

नेताओं की पौबारह
नाम्र्स के लिहाज से तो प्रत्येक विकासखंड में लाभान्वित होने वाली छात्राएं सूचीबद्ध होना चाहिए थीं लेकिन अधिकांश जगह ऐसा नहीं किया गया और जानकारी अंदाज से ही तैयार करके भेज दी गई। इसका परिणाम यह हुआ कि विकासखंडों में साइकिलें पहुंचते ही निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधि व प्रभावशाली नेताओं से जुड़े लोग सक्रिय हो गए और उन्होंने साइकिलें अपात्र लोगों को दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अफसर भी उनसे इंकार नहीं कर पाए। साथ ही जन शिक्षकों ने महज टारगेट पूरा करने के लिए प्रधानाध्यापकों पर ऐसी बालिकाओं को सूची में शामिल करने के लिए दबाव बनाया, जो किसी भी स्थिति में उसके योग्य नहीं थी।





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