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लोकतंत्र को बढ़ाना चुनौती

विशेष यूरोपीय संघ और भारत के संबंधों के संदर्भ में इस वर्ष हमें पिछले साल के ही एजेंडे पर काम जारी रखना होगा। यूरोपीय संघ और भारत ने पिछले वर्षो में जिन विविध क्षेत्रों में सहयोग शुरू किया या बढ़ाया था, उसके व्यापक आयाम को देखते हुए हमारे सामने चुनौती काफी बड़ी है।

भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत के रूप में हाल ही में काम संभालने के नाते मैं यहां के लोगों को यह याद दिलाना अपनी जिम्मेदारी समझती हूं कि अपनी-अपनी प्रतिबद्धताओं को कार्य रूप देना हमारी जिम्मेदारी है।

व्यापक आधार वाले व्यापार व निवेश समझौते के लिए चल रहीं वार्ताओं को उनके मुकाम तक पहुंचाने का इसमें खास महत्व है। एफटीए (मुक्त व्यापार क्षेत्र) पर वार्ता की प्रक्रिया खासी लंबी है और बहुत महत्वाकांक्षी भी। ऐसे में वार्ताकारों पर दबाव बनाए रखना जरूरी है। उन्हें बार-बार याद दिलाना होगा कि 2008 के अंत तक वार्ता पूरी हो ही जानी चाहिए। यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि दोनों पक्ष वस्तुओं और सेवाओं के मामले में अच्छे प्रस्ताव पेश करें ताकि सार्थक वार्ताएं शुरू हो सकें और मुश्किल मुद्दे शीघ्र सुलझ सकें।

भारत के पड़ोसी देशों में स्थायित्व और लोकतंत्र को प्रोत्साहित करना यूरोपीय संघ और भारत के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है। इसके लिए हम भारत के साथ निकट सहयोग करने तथा सार्क के ढांचे में दक्षिण एशिया के एकीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए तत्पर हैं।

दक्षिण एशिया में यूरोपीय संघ विकास सहायता के अलावा आर्थिक, व्यापारिक व मानवाधिकार उपायों और लोकतंत्र की नीतियों के माध्यम से सक्रिय है। इस संदर्भ में यूरोपीय संघ की हाल की ये घोषणाएं प्रासंगिक हैं कि वह पाकिस्तान में प्रस्तावित चुनावों के लिए पर्यवेक्षक तैनात करेगा तथा म्यांमार को 1.80 करोड़ यूरो की मानवीय सहायता देगा।

यूरोपीय संघ के तीन बड़े नेताओं की दिसंबर में हुई नेपाल यात्रा और हाल में आए तूफान के पीड़ितों को राहत पहुंचाने के लिए बांग्लादेश को दी गई मदद का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। भारत में यूरोपीय संघ की उपस्थिति को बढ़ाना और उसकी भूमिका व कार्यकलापों के बारे में बेहतर समझ विकसित करना मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

मैं भारतीय अधिकारियों को यूरोप के उदाहरण से सीख लेने की सलाह दूंगी। यूरोप इसका अनूठा उदाहरण है कि आर्थिक एकीकरण की प्रक्रिया ने उसके देशों में बीते 60 वर्र्षो में शांति, स्थायित्व, लोकतंत्र और प्रगति की निरंतरता बनाए रखी है। यूरोपीय संघ से निकट सहयोग स्थापित करके भारत निश्चित रूप से विकास के अपने लक्ष्यों की ओर तेजी से बढ़ सकता है।(डैनियल समद्जा भारत में यूरोपीय संघ की राजदूत हैं)





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