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बीकानेर. राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग और डेयरी -फूड साइंस कॉलेज खोलने के प्रस्तावों को अब तक हरि झंडी नहीं मिल सकी है। यही कारण है कि सुखाड़िया विवि से अलग होने के बाद कृषि विश्वविद्यालय अब तक पूरी तरह विकसित की श्रेणी में नहीं आ पाया है जबकि महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय उदयपुर के पास इंजीनियरिंग होने से छात्रों का रुझान उस विवि की ओर अधिक हो रहा है। इस लाभ वहां के काश्तकारों को भी मिल रहा है।
पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा कमांड एरिया होने के बाद अब यहां इंजीनियरिंग कॉलेज की आवश्यकता महसूस की जा रही है। विवि ने 2005 में बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की बैठक में इंजीनियरिंग व डेयरी-फूड साइंस कॉलेज की स्थापना का प्रस्ताव तैयार सरकार को भेजा था।
इसके अलावा 11वीं पंचवर्षीय योजना में होने वाले विकास कार्यो में भी इस मुद्दे को शामिल किया था लेकिन उदयपुर में वेटेरनरी व लालसोट में कृषि महाविद्यालय खुलने के कारण इन दोनों कॉलेजों से सरकार का ध्यान हट गया। दरअसल आदर्श कृषि विवि तभी तैयार हो सकता है जबकि उसमें सभी फैकल्टी हो।
राजस्थान कृषि विवि के पास अब तक वेटेरनरी, होमसाइंस व कृषि है लेकिन डेयरी-फूड साइंस, इंजीनियरिंग विंग अधूरी है, जिसकी वजह से आदर्श कृषि की दौड़ में कृविवि काफी पीछे है। यह बात विवि के वैज्ञानिक से लेकर उच्च पदाधिकारी तक मानते हैं। उनका कहना है कि विवि ने अपनी ओर से दोनो फैकल्टी स्थापित करने के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा था, जिसकी स्वीकृति का इंतजार किया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक मॉनिटरिंग विभाग ने भी आगामी प्लान में इस पर कार्य किया है। फैकल्टी और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी का खमियाजा कृविवि को एक्रीटेशन के दौरान भी उठाना पड़ा था। इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित करने पर अधिक जोर दिया जा रहा है। वेटेरनरी कॉलेज में डेयरी साइंस व विवि कैंपस में इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित करने की योजना है।
>> इंजीनियरिंग व डेयरी-फूड साइंस कॉलेज की आवश्यकता है। इसके लिए प्रयास भी किए जा रहे हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना में इस विषय को शामिल किया गया। सरकारस्तर पर भी विचार चल रहा है। इससे यहां के किसानों का विकास होगा।
-प्रो.प्रताप नारायण, कुलपति राजस्थान कृषि विवि
क्यों जरूरत है दो फैकल्टी की
पश्चिमी राजस्थान को दूध का डेन्मार्क कहा जाता है वह इसलिए क्योंकि राज्य का 40 प्रतिशत दुग्ध उत्पादन पश्चिमी राजस्थान में होता है। संभावनाओं को देखते हुए यहां के कई जिलों में निजी क्षेत्र की डेयरियों ने अपना कार्य शुरू कर दिया है। इसी को ध्यान में रखते हुए विवि डेयरी-फूड साइंस कॉलेज स्थापित करना चाहता है।
इसके अलावा इंदिरा गांधी नहर परियोजना के आने से यहां सबसे अधिक कमांड एरिया है। किसानों को नई तकनीक चाहिए। खेती से संबंधित नए उपकरणों की आवश्यकता है लेकिन यहां इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं होने से अभी भी उदयपुर पर निर्भर होना पड़ रहा है। दो फैकल्टी स्थापित करने के लिए कमेटी भी गठित हुई थी जिसमें पूर्व कुलपति परमात्मासिंह व एमपीयूएटी के कुलपति एस.एल.मेहता को शामिल किया गया था।
स्थानीय स्तर पर भी संशोधन जरूरी
आईएबीएम ने राष्ट्रीयस्तर पर पहचान बनाई है। विवि ने उसे फैकल्टी का दर्जा दे दिया लेकि न इसका नाम संस्थान रखा गया। जब यहां डिग्री दी जाती है तो संस्थान शब्द का कोई मतलब नहीं है। इसे कॉलेज की संज्ञा की आवश्यकता है।
विवि को बोम में यहां निदेशक के बजाय अधिष्ठाता कहलाने का अधिकार देना चाहिए। इसके अलावा होमसाइंस के अधिष्ठाता का पद अब एसोसिएट प्रोफेसर है जबकि अन्य कॉलेजों में अधिष्ठाता सीनियर प्रोफेसर होता है। विवि को बोम में डीन पद के लिए अपग्रेड करते हुए प्रोफेसर को डीन का हकदार बनाना होगा।