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ढूंढने से भी नहीं मिलते परम विशेषज्ञ

कोटा. सरकारी अस्पतालों में परम विशेषज्ञों का टोटा आम बात होती जा रही है। कोटा मेडिकल कॉलेज से सम्बद्ध एमबीएस अस्पताल व जे.के.लोन चिकित्सालय इसका एक उदाहरण हैं। इसके कारण आम जनता को सुपरस्पेशलिस्ट सेवाओं का लाभ नहीं मिल पाता है।

राजस्थान में केवल जयपुर में ही एमसीएच व डीएम करने की सुविधा है। एमसीएच की डिग्री सर्जरी परम विशेषज्ञ के लिए तथा डीएम मेडिसिन विभाग के परम विशेषज्ञ के लिए होती है। प्रत्येक विभाग के परम विशेषज्ञ के लिए सीटें सीमित होती हैं तथा उन्हें राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा को पार करना पड़ता है। इसके बाद ही इसमें प्रवेश मिल पाता है। तीन वर्ष बाद उसे डिग्री मिल पाती है।

इससे पहले भी मेडिकल स्टूडेंट पढ़ाई का लंबा सफर तय करके वहां तक पहुंचता है। कोटा मेडिकल कॉलेज से सम्बद्ध एमबीएस अस्पताल व जे.के.लोन मातृ एवं शिशु चिकित्सालय में पिछले काफी लंबे समय से कई परम विशेषज्ञों के पद स्वीकृत हैं।

इन पदों को तदर्थ से भरने के लिए भी चिकित्सा शिक्षा सचिव ने स्वीकृति दे रखी है। लेकिन, अभी तक विषय विशेष के परम विशेषज्ञों ने सरकारी अस्पतालों में सेवा देने में कोई रूचि नहीं दिखाई है। जे.के.लोन मातृ एवं शिशु चिकित्सालय के शिशु शल्य चिकित्सक का पद लगभग डेढ़ वर्ष से रिक्त पड़ा है।

निजी अस्पतालों की ओर झुकाव
परम विशेषज्ञ बनने के बाद डॉक्टरों का झुकाव निजी चिकित्सालयों में सेवा देने की ओर ज्यादा रहता है। वह सरकारी अस्पतालों में सेवाएं देने से कतराता है। इसका मुख्य कारण सरकारी अस्पतालों में निजी की तुलना में वेतनमान व सुविधा अधिक मिलती है। इसके अलावा उसे तबादले का भय भी नहीं रहता।

पढ़ाई का लंबा सफर
परम विशेषज्ञ बनने के बाद डॉक्टरों का झुकाव निजी चिकित्सालयों में सेवा देने की ओर ज्यादा रहता है। वह सरकारी अस्पतालों में सेवाएं देने से कतराता है। इसका मुख्य कारण सरकारी अस्पतालों में निजी की तुलना में वेतनमान व सुविधा अधिक मिलती है। इसके अलावा उसे तबादले का भय भी नहीं रहता।

परम विशेषज्ञ बनने के लिए एक युवा चिकित्सक को पढ़ाई का लंबा सफर तय करना पड़ता है। उसे लगभग 12 से 15 वर्ष की पढ़ाई करनी होती है। इसमें युवक को एमबीबीएस की पढ़ाई साढ़े चार वर्ष, एक वर्ष की इन्टर्नशिप के बाद 3 वर्ष की एमडी की डिग्री लेनी होती है। इसके बाद शुरू होता है परम विशेषज्ञ के लिए पढ़ाई का सफर। इसकी डिग्री तीन वर्ष में मिलती है।

क्या कहते हैं परम विशेषज्ञ
>> सीटें कम होती है। पढाई का लंबा सफर तय करना पड़ता है। निजी अस्पतालों में सरकारी की तुलना में पैसा व सुविधा अच्छी मिलती है।
डा. समीर मेहता, शिशु शल्य चिकित्सक

>> सरकारी अस्पतालों में पद भरने के बाद बेसिक सुविधा नहीं मिल पाती। इस कारण कई परम विशेषज्ञ काम छोड़ जाते हैं।
डा. कृष्ण हरि शर्मा, न्यूरोसर्जन





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