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किसी से भी बदला लेने का सबसे अच्छा तरीका उस पर जीत हासिल करना है, न कि पुतले जलाना या खराब अंपायरिंग के लिए भुनभुनाना अथवा खेल भावना को बला-ए-ताक रखने के लिए ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को दोष देना। हालांकि सच यही है कि सिडनी टेस्ट में ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने जोड़-तोड़ करके जीत हासिल की। सिडनी मॉर्निग हेराल्ड में पीटर रोबक ने लिखा भी है कि रिकी पोंटिंग ने पेशेवर क्रिकेटरों की टीम को जंगली कुत्तों के झुंड में बदल दिया है लेकिन हकीकत है कि पोंटिंग वही सब कर रहे हैं जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है। यह अपेक्षा है ऑस्ट्रेलिया के लिए सीरीज जीतना। हाल के वर्षाे में ऑस्ट्रेलिया के हरेक कप्तान से यही अपेक्षा की जाती रही है कि वह विपक्षी टीम को कुचल डाले और येन-केन-प्रकारेण जीत हासिल करे। वे यह फिक्र नहीं करते कि क्रिकेट 'जेटलमेंस गेम' है।
उन्होंने कभी कहा भी नहीं कि वे खेल को उसके नियमों के तहत खेलते हैं। वे केवल जीत के लिए खेलते हैं और अक्सर जीतते भी हैं। वे भले ही क्रिकेट के बिगड़े बच्चे हों लेकिन वे अपराजेय भी हैं। इसके बावजूद हमने ट्वेंटी-20 क्रिकेट का वल्र्ड कप जीत लिया। कोई दूसरी टीम होती तो उसका घमंड चूर-चूर हो जाता मगर ऑस्ट्रेलिया ने ट्वेंटी-20 वल्र्डकप में हुई हार से नसीहत ली और हम पर जवाबी हमला किया। उन्होंने हमारे खेल का अध्ययन किया, हमारी टीम के हरेक सदस्य की खूबियों और खामियों का विश्लेषण किया और सिडनी टेस्ट में हम पर पार पाने के लिए हर तरह के हथकंडे आजमाने और धूर्तता बरतने में कोई कसर नहीं रखी।
जरा सद्दाम को याद करें। अमेरिका ने उस पर व्यापक विध्वंस के हथियारों (डब्लूएमडी) का जखीरा जुटाने का आरोप मढ़ा और उसकी शैतान की छवि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कोई ठोस सबूत नहीं होने के बावजूद 9/11 के लिए उस पर दोष मढ़ा। सद्दाम इस सबका खंडन करता रहा और कहता रहा कि अमेरिका उसके साथ नाइंसाफी कर रहा है, तथ्यों को तोड़-मरोड़ रहा है मगर उसकी किसी ने नहीं सुनी। अमेरिका ने इराक पर हमला किया, सद्दाम का तंत्र तहस-नहस किया, फिर उसे खोज निकालकर उस पर मुकदमा चलाया और उसे दोषी ठहराकर सूली पर लटका भी दिया। न तो इराक में डब्लूएमडी मिले और न ही 9/11 के हमलों से सद्दाम का कोई संबंध साबित हो सका, मगर इतिहास में सद्दाम का नाम एक ऐसे खलनायक के रूप में ही दर्ज किया जाएगा जो अमेरिका के युद्ध तंत्र से हार गया। उसे इतिहास एक पीड़ित के रूप में नहीं देखेगा। कारण, इतिहास हमेशा विजेता और उसके चाटुकार ही लिखते हैं। इसलिए हार के बाद किसी को भी न्याय नहीं मिलता। क्रिकेट में भी यही बात लागू होती है।
हमने अंपायरों के गलत फैसलों के विरोध में मैदान नहीं छोड़कर अपने विकल्प खुद ही बंद कर दिए। सचाई कुछ भी क्यों न हो, हारे हुए लोगों की बात कोई नहीं सुनता। प्राय: यही माना जाता है कि वे हार जाने के कारण आपा खो बैठे हैं। बहुधा ऐसे विवाद क्षणभंगुर होते हैं। लोग इन्हें उसी तरह जल्दी ही भुला देते हैं जैसे मीडिया कोई नई बड़ी घटना होने पर पुरानी घटना को भूल जाता है। यदि कुंबले और उनकी टीम आने वाले टेस्ट मैचों में जीत हासिल करके नहीं दिखाती तो उनका भी यही हश्र होगा। तमाम रोने-पीटने से हमें तब तक कुछ हासिल नहीं होगा जब तक कि हम ऑस्ट्रेलिया को उसी के घर में हरा कर अपनी क्षमता दुनिया को नहीं दिखा देते।
आज के दौर में हरेक मुकाबला कठिन, संघर्षपूर्ण, अधिक उग्र और आक्रामक हो चला है। अब जीत महत्वपूर्ण ही नहीं, बल्कि सभी कुछ है। इसे हासिल करने के लिए नियमों में तोड़-मरोड़ करना, जोड़-तोड़ से अंपायरों को प्रभावित करना, माइंड गेम खेलना, विपक्षी खिलाड़ियों पर फब्तियां कसना, उनकी झूठी शिकायतें करना सब कुछ जायज है। ऐसे में हम पोंटिंग की टीम को ऑस्ट्रेलिया में ही पराजित करके उसके चेहरे पर कीचड़ डाल सकेंगे और क्रिकेट की दुनिया में अपना लोहा मनवा सकेंगे। मौजूदा हालात में नाहक गुस्सा दिखाना बेमतलब है।
इसके मायने हैं कि हमें दौरा बीच में छोड़कर लौटने की बात नहीं करनी चाहिए। हमें अपना पूरा ध्यान खेल पर केंद्रित करना चाहिए और बचे हुए टेस्ट मैचों और अन्य मुकाबलों में ज्यादा से ज्यादा जीत हासिल करने के लिए अपनी पूरी क्षमता दांव पर लगा देनी चाहिए। एक जरूरी बात और, वह यह कि अंपायरों से न्याय व सही निर्णय की अपेक्षा करने की बजाय ऑस्ट्रेलियाइयों की तरह हमें भी उन्हें अपने पक्ष में निर्णय देने के लिए प्रभावित करने की कोशिश करनी चाहिए। हमें ऑस्ट्रेलियाइयों की फब्तियों और गालियों का जवाब उन्हीं के अंदाज में देना चाहिए। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि वे गलतियां करने पर मजबूर हों। उन्हें परेशान करने के लिए हमें हरसंभव मनोवैज्ञानिक तरीका आजमाना चाहिए। हमें हर हाल में जीत हासिल करनी चाहिए और फिर ऑस्ट्रेलियाइयों को यह बताना चाहिए कि क्रिकेट खेलने का सही तरीका क्या है। तब सारी दुनिया हमारी बात सुनेगी। याद रखें कि नियम विजेता ही बनाते या तय करते हैं। नैतिकता की नई परिभाषाएं गढ़ने के पहले क्रिकेट के मैदान पर हमारा जीतना जरूरी है।