HomeNewsChhattisgarhRaipur Raipur

आंबेडकर अस्पताल में दवाइयां खत्म

रायपुर. अस्पताल की ओपीडी में आने वाले मरीजों को दवा अस्पताल से देने की बजाय सूची थमायी जा रही है। वार्ड में भर्ती मरीजों का इलाज करवाने के लिए उनके रिश्तेदारों को जरुरत की दवाओं में से आधे से ज्यादा मेडिकल स्टोर से खरीदकर लाना पड़ रहा है। यह इसलिए हो रहा है कि अस्पताल का बजट खत्म हो चुका है। मरीज का छोटे से छोटा आपरेशन करने के पहले उसके अटेंडर को जरुरी उपकरणों के साथ-साथ मलहम पट्टी तक मंगवाई जा रही है।

आपरेशन थियेटर(ओटी) में प्राय: हर तरह की सर्जरी के लिए सेवलान मलहम की जरुरत पड़ती है। इस मलहम के जरिये शरीर के उस हिस्से को धोया जाता है, जहां सर्जरी की जानी है। मरीज के रिश्तेदार जब तक यह मलहम उपलब्ध नहीं करवाते, आपरेशन नहीं किया जाता। ओटी में शरीर के हिस्सों को सिलने के लिए उपयोग किया जाने वाला सूचर भी करीब एक महीने से नहीं है।

अस्पताल के किसी भी वार्ड में आईवी सेट(ग्लूकोज लगाने का उपकरण) का इतना स्टाक नहीं है कि सभी मरीजों को उपलब्ध कराया जा सके। पिछले डेढ़ महीने से स्टोर से इसकी इतनी कम सप्लाई की जा रही है कि वार्ड का मैनेजमेंट संभालने वाली नर्स्े उन्हें ऐसे मरीजों को उपलब्ध करवाती हैं, जो बेहद गरीब हैं और किसी भी हालत में बाजार से खरीदकर नहीं ला सकते। बाकी मरीजों के लिए आईवी सेट बाजार से मंगवाया जाता है।

हद तो यह है कि अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड से लेकर आपरेशन थियेटर तक गाज बेंडेज गायब है। मरीजों के रिश्तेदारों को मजबूरी में गाज बेंडेज बाजार से लाकर देना पड़ता है। जीवन रक्षक टेबलेट और इंजेक्शन का भी यही हाल है। नाम न छापने की शर्त पर वार्ड ब्वाय और नर्र्सो ने बताया कि हम हर हफ्ते इंडेन भरकर अस्पताल के स्टोर में जाते हैं। नाममात्र की दवा और अन्य सामग्री उपलब्ध कराने के साथ-साथ यह हिदायत दी जाती है कि इतने में पूरा हफ्ता चलाना है।

अब आप लोग कैसे मैनेज करेंगे खुद जाने। अस्पताल कर्मियों ने बताया कि इन हालात में गरीब और लावारिस मरीजों के लिए सामान बचाकर रखना पड़ता है वर्ना उनके गुस्से का शिकार होना पड़ता है।

4.15 करोड़ का बजट साफ

आंबेडकर अस्पताल का बजट एक महीने पहले खत्म हो चुका है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने 4.15 करोड़ रुपए अलग-अलग मदों पर खर्च करने दिए थे। 2.75 करोड़ रुपए सामान्य दवाओं के लिए दिया गया था। 1 करोड़ रुपए केवल कैंसर के मरीजों को दवाएं उपलब्ध कराने के लिए दिए गए थे।

40 लाख रुपए पेंशनरों के लिए दिया गया था। जानकारों ने बताया कि पिछले वर्ष की तुलना में अधिक बजट दिए जाने के बाद भी 9 महीने में ही पूरी रकम खत्म हो गई और अस्पताल में जीवन रक्षक दवाओं का टोटा हो गया। हालांकि बजट देने के साथ ही अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिए गए थे कि अनुपातिक व्यय करें। बजट से ज्यादा रकम खर्च नहीं होनी चाहिए।

दवा की कमी से अस्पताल प्रशासन भी अवगत है, लेकिन ऐसा बजट नहीं होने के कारण हुआ। अब मरीजों को परेशानी नहीं होगी, क्योंकि शासन से हाल ही में एक करोड़ रुपए की राशि मिली है। स्टोर रूम में कम पड़ने वाली सारी दवाइयां जल्द से जल्द मंगवा ली जाएंगी।
—डा. विवेक चौधरी, अधीक्षक, आंबेडकर अस्पताल





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: