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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior ग्वालियर.
सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) के तहत ग्वालियर-चम्बल सभाग में पिछले साल लगभग तीस हजार बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल किया गया और इन पर दो करोड़ 80 लाख रुपये खर्च किए गए, मगर यह बताने को कोई तैयार नहीं है कि यह बच्चे किन स्कूलों में व किन हालातों में हैं।
वस्तुस्थिति यह है कि इनमें से अधिकांश बच्चे कागजी थे, जो कागजों में गुम हो गए। ग्वालियर-चम्बल संभाग में प्राइमरी व मिडिल स्कूल स्तर पर जहां बीस प्रतिशत से अधिक छात्र-छात्राएं बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। इसके पीछे कहीं पारिवारिक मजबूरी, तो कहीं स्कूलों में संसाधनों की अनुपलब्धता मुख्य कारण रही है। इसलिए एसएसए के स्कूल आपके द्वार की तर्ज पर कई योजनाएं प्रारंभ की गईं, ताकि ड्राप आउट रट को कम किया जा सके। लेकिन यह अच्छी योजनाएं अव्यवस्थाओं के चलते परवान नहीं चढ़ सकी।
आवासीय ब्रिज कोर्स (आरबीसी) को ही लीजिए। इसके तहत 8-14 वर्ष के शाला त्यागी या अप्रवेशी बच्चों को नौ माह का कैप्सूल कोर्स कराकर शिक्षा की मुख्य धारा में लाना था। इसमें प्रति छात्र खर्चा छह हजार 35 रुपये था। आरबीसी संचालन समिति का सचिव संबंधित जन शिक्षक को बनाया गया। पिछले साल ग्वालियर अंचल में 41 आवासीय केंद्रों पर दो करोड़ रुपये खर्च किए गए। सर्वाधिक 12 केंद्र श्योपुर जिले में तथा मुरैना में चार, भिंड में दो, ग्वालियर में चार, शिवपुरी में आठ, दतिया में दो, गुना में पांच एवं अशोक नगर में चार केंद्र स्थापित किए गए।
जन शिक्षकों के लिए आरबीसी कमाई का जरिया साबित हुए। उन्होंने अपने क्षेत्र के सरकारी स्कूलों से ही बच्चे छांटकर आरबीसी में दर्ज करा दिए और फिर नौ माह का कोर्स पूरा होने के बाद उनका नामांकन नजदीकी स्कूल में करा दिया। सूत्रों के मुताबिक अधिकांश केंद्र कागजों पर ही चले। बच्चों की संख्या भी बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की गई, अर्थात चार बच्चों को रोकने की व्यवस्था पर 40 बच्चों का भुगतान हासिल किया गया।
आलम यह कि कुछ स्कूलों में तो जन शिक्षकों ने इसके लिए नए सिर से ही हाजिरी रजिस्टर बनवा दिए और आरबीसी में दर्ज कराए बच्चों को दो-तीन माह से स्कूलों में अनुपस्थित ठहरा दिया। कुछ मामले ऐसे भी हैं, जिनमें बच्चों का नाम आरबीसी व उसके गांव के स्कूल में भी दर्ज है। यदि आरबीसी में दर्ज बच्चों का भौतिक सत्यापन और गांव एजुकेशन रजिस्टर (वीईआर) को देखा जाता, तो वस्तुस्थिति सामने आ जाती।
ग्वालियर शहर के पागनवीसी स्कूल में आवासीय ब्रिज कोर्स संचालित हुआ। सूत्रों की मानें तो यहां प्रारंभ में तो 8-10 बच्चे रहे लेकिन उसके बाद यह कागजों पर ही दौड़ा। अन्य जिलों के केंद्रों की भी कमोवेश यही स्थिति रही। इन केद्रों के लिए आया बजट और छात्रों के नाम पर मंगाई गई सामग्री शिक्षकों की नजर हो गई। मुरैना में 12.50 लाख, ग्वालियर में 3.41 लाख, दतिया में 5.18 लाख व गुना में 8 लाख रुपये स्वीकृत राशि से अधिक खर्च किए गए। वर्ष 2007-08 के लिए अंचल में 71 आरबीसी (50 सीटर) हेतु दो करोड़ 61 लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं।
गैर आवासीय ब्रिज कोर्स (एनआरबीसी) की हालत तो और भी दयनीय रही। पारिवारिक मजबूरियों के चलते स्कूल नहीं आने वाले बच्चों को उनकी सुविधा के अनुसार पढ़ाने के लिए ग्वालियर अंचल में पिछले वर्ष 51 लाख रुपये खर्च करके 1080 एनआरबीसी केंद्र संचालित किए गए। इसमें प्रत्येक बच्चे पर 1535 रुपये का व्यय तय था। अधिकांश एनआरबीसी केंद्र कागजों पर संचालित रहे तथा इसके लिए आया बजट बंदरबाट का शिकार हो गया।
सूत्रों के मुताबिक, जन शिक्षक की ओर से केंद्र का प्रस्ताव मिलते ही बीआरसीसी व डीपीसी स्तर पर कमीशन के ब्रेकर खड़े कर दिए जाते थे। चालू शिक्षा सत्र में 887 एनआरबीसी के लिए एक करोड़ 77 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। इसमें से कुछ राशि खर्च भी कर दी गई है, किंतु शासनस्तर से जब भौतिक सत्यापन की बात आई तो कई केंद्र कागजों में ही दफन हो गए।
अस्थायी डेरों-टपरों या झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों के बच्चों की पढ़ाई की चिंता भी एसएसए में की गई है। ऐसे बच्चों के लिए पिछले सत्र में स्थापित 44 मानव विकास केंद्रों पर 15 लाख रुपये खर्च किए गए। इस सत्र में भी अंचल के विभिन्न जिलों में मानव विकास केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों में भी खूब फर्जीवाड़ा किया गया। राज्य शिक्षा केंद्र से जुड़े सूत्रों के मुताबिक गत दिवस अंचल के आठ जिलों के लिए कुल 32 आरबीसी, 128 एनआरबीसी व छह मानव विकास केंद्रों की सीमा तय की गई है। यह कदम इमसें व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने के लिए उठाया है लेकिन उनके पास इसका जवाब नहीं है कि पिछले सत्र में दर्ज किए गए तीस हजार से अधिक बच्चे आखिर कहां गए?
कहां हैं शिशु शिक्षा गृह
तीन साल से छह साल तक के बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने के लिए प्रत्येक शिशु शिक्षा गृह पर पांच हजार रुपये वार्षिक खर्च किए जाते हैं। पिछले साल अंचल में 648 केंद्रों पर साढ़े 36 लाख रुपये खर्च किए गए। चूंकि यह केंद्र जन शिक्षकों के रहमोकरम पर थे, इसलिए उन्होंने अपने ही नाते-रिश्तेदारों के नाम पर शिशु गृह दर्ज करा दिए।
नियमानुसार, यह केंद्र उस बसाहट व गांवों में खोले जाने थे जहां आंगनबाड़ी केंद्र न हो। इन केंद्रों पर पोषण आहार भी बच्चों को उपलब्ध कराया जाना था लेकिन इसका पालन नहीं किया गया। यदि इन केंद्रों का किसी बाहरी टीम से भौतिक सत्यापन कराया जाए तो भ्रष्टाचार सामने आ जाएगा।